शुक्रवार, 6 फ़रवरी 2009

मैं भला क्यों नाराज़ होने लगा !

प्रिय श्री संजय ग्रोवर, (www.samwaadghar.blogspot.com)

 

           सबसे पहली शिकायत तो ये कि आपको सत्य, सरल ह्रृदय से की हुई प्रशंसा भी मेरी नाराज़गी लगी, तीखा कमेंट लगी - इससे मैं बहुत क्लेश का अनुभव कर रहा हूं । कई बार पढ़ा है कि शब्द बहुत बेइमान होते हैं।  कोई व्यक्ति अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिये जिन शब्दों का चयन करता है, वही शब्द सामने वाले के सम्मुख कुछ और भावनायें व्यक्त कर आते हैं ।  मेरी लेखनी आप के जैसी समर्थ नहीं है - यह तो स्पष्ट हो ही गया। 

 

            हां, ये भी सम्भव है कि आपको अपनी प्रशंसा सुनने का व उसे विनम्रता पूर्वक स्वीकार करने का अभ्यास न हो।  शायद इसीलिये आप प्रशंसा में भी निहितार्थ ढूंढते रहते हैं ।  मैने पिछली बार आपके हृदय की विशालता की बात कही, आपको वह बुरी लगी; इस बार आपका लेखन अच्छा लगा, तो उसमें भी आपको व्यंग्य नज़र आयाआपको शायद लगता है कि 'ये समाज इतना खराब है, इसमें सब लोग इतने घटिया हैं, यहां की सारी व्यवस्थायें इतनी शोषणकारी हैं, ऐसे में भला कोई व्यक्ति खुले दिल से किसी की प्रशंसा  क्यों करने लगा!!!!  जरूर इसमे कोई न कोई व्यंग्य या ताना छिपा होगा ।'    मुझे तो ये भय लगने लगा है कि मैं कुछ भी लिखूंगा आप उसमे निहितार्थ निकालते चले जायेंगे।  भाई ग्रोवर जी, आप शब्दों पर मत जाओ, "भावनाओं को समझो" !

 

            हर व्यक्ति की सोच उसके अनुभवों के आधार पर बनती है।  इन अनुभवों में उसकी शिक्षा - दीक्षा, उसके संस्कार -- सभी कुछ आ जाता है। 'मेरी सोच मेरे लिये सही है' और 'आपकी सोच आपके लिये सही है' इतना तो ठीक है ही, पर मुझे यह गुंजाइश अवश्य रखनी चाहिये कि मेरी ही सोच नहीं, आपकी सोच भी सही है / सही हो सकती है।  दुनिया में तीन प्रकार के सच हैं - मेरा सचआपका सच और वास्तविक सच

 

            आप इस समाज के लिये मिशन स्टेट्मैंट नहीं लिखना चाहते, मत लिखिये पर जिस 'शोषणकारी व्यवस्था' में रहने के लिये आप स्वयं को विवश पा रहे हैं, उसके प्रणेताओं ने जो मिशन स्टेट्मैंट,  जो लक्ष्य अपने सम्मुख रखा था, उसे उन्होंने निम्न शब्दों में व्यक्त किया था -

 

"सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे संतु निरामयाः

सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद्भाग्भवेत !" 

(सब सुखी हों, सब निरोगी हों, सब परस्पर प्रेमभाव रखें, किसी को भी कोई दुःख न हो ।)

 

कुछ ऐसी ही भावनाओं का प्राकट्य एक और श्लोक में पढ़ने को मिला -

 

"न त्वमहं कामये राज्यं, न स्वर्गं न पुनर्भवं

कामये दुःखत्प्तानां प्राणिनामार्तिनाशनम्

(न तो मुझे आपसे राज्य चाहिये, न स्वर्ग की ही कामना है, न मुझे पुनर्भव की लालसा है।  मैं तो केवल यही कामना करता हूं कि दुःख पीड़ित मानवता के कष्टों का नाश हो ।)

 

            एक और स्थान पर मैने पढ़ा था - "न राज्यं न च राजासीत, न दंडो, न च दांडिकः ......" 

(न तो कोई राजा हो, न ही कोई शासित हो, न कोई दंड देने वाला हो और न ही कोई दंड पाने वाला होहर कोई अपने - अपने धर्म का पालन करते हुए समरस समाज बना कर सुखपूर्वक रहे!)   

 

            अब प्रश्न उठता है कि मेरा धर्म यानि मेरे कर्तव्य क्या हैंधर्म को परिभाषित करते हुए कहा गया था कि हर व्यक्ति के दो प्रकार के धर्म हैं - एक उसका व्यक्तिगत धर्म और दूसरा उसका सामाजिक धर्मधैर्य, क्षमा, अहिंसा, पवित्रता आदि दस धर्म गिनाये गये - जो व्यक्तिगत धर्म की श्रेणी में आते हैं ।  दूसरी ओर समाज की भिन्न भिन्न इकाइयां (मेरा परिवार, मेरा पड़ोस, मेरा मुहल्ला, मेरा नगर, मेरा जिला, प्रदेश, देश, यह दुनिया, यह सृष्टि)- उनके प्रति मेरा धर्म - यह मेरा सामाजिक धर्म है !  - ये सब आकार में बढ़ते हुए क्रम में आते हैं। मुझे अपने स्वयं के प्रति कर्तव्यों का तो निर्वहन करना है, पर इन सब सामाजिक इकाइयों के प्रति जो मेरे कर्तव्य हैं, उन सब का भी पालन मुझे करना है। 

 

            क्या कभी ऐसी स्थिति आयेगी जब दो भिन्न भिन्न इकाइयों के प्रति मेरे कर्तव्यों के बीच में टकराहट होने लगेजी हां, इस स्थिति की भी पूर्व कल्पना करते हुए कहा गया कि मुझे बड़ी इकाई को प्राथमिकता देनी होगी।  यदि मैं देश की तुलना में अपने प्रदेश को प्राथमिकता देता हूं तो अधार्मिक कहलाऊंगा, अपने कर्तव्य से विमुख हो गया माना जाऊंगा । यदि अपने बीवी-बच्चों के लालन-पालन के अपने दायित्व को भूल कर अपने व्यक्तिगत उत्थान के लिये सन्यासी बन जाऊं तो अधार्मिक हूं ।  पवित्रता मेरा व्यक्तिगत धर्म है पर अगर मैं डॉक्टर हूं तो मरीज़ का इलाज करना मेरा सामाजिक धर्म है और इस धर्म के पालन के लिये मुझे खून, थूक, मल, मूत्र, मवाद के बीच में रहना पड़ सकता है। 

 

            मान लीजिये मैने सत्य बोलने का व्रत ले रखा है।  बड़ी अच्छी बात है।  ये मेरा व्यक्तिगत धर्म है कि मैं सत्यव्रत का पालन करूं ।  पर, कल्पना कीजिये कि 'मुझे बचाओ-बचाओ' चीखती हुई कोई युवती अस्त - व्यस्त, फटे वस्त्रों में, घबराई हुई सड़क पर भागी चली आ रही दिखाई देती है और मेरे देखते-देखते मेरे घर के बगल में आबचक में छुप जाती है। क्षण भर पीछे ही दस पांच गुंडे आकर मुझसे पूछें कि किसी लड़की को इधर से जाते देखा क्यातो ऐसे में मुझे क्या करना चाहियेयदि मैं अपने सत्य व्रत का पालन करने के लिये उनको बता देता हूं कि जिसे ढूंढ रहे हो, वह लड़की इस आबचक में छुपी बैठी है तो हमारे प्राचीन मनीषियों की निगाह में मुझसे बड़ा अधार्मिक व्यक्ति कोई नहीं ।  इसी प्रकार, अहिंसा मेरा व्यक्तिगत धर्म है पर सैनिक के नाते देश पर हमला करने आये दुश्मनों को मार गिराना मेरा सामाजिक धर्म है - मुझे अपने व्यक्तिगत धर्म का नहीं, सामाजिक धर्म का पालन करना होगा।  अपनी व्यक्तिगत शत्रुता के कारण किसी को मार देने पर फांसी मिलेगी पर देश की रक्षा करते हुए शत्रुओं को मार गिराऊं तो भारत रत्न मिलेगाऔर आगे बढ़ कर सोचेंअगर अपने देश की रक्षा करने के नाम पर मैं हिरोशिमा - नागासाकी पर बम फेंक दूं तो मानवता का सबसे बड़ा शत्रु !      

 

            ग्रोवर जी, ऐसा नहीं है कि आज आपको जो विकृतियां इस समाज में दिख रही हैं, उनसे मैं अपरिचित हूं।   जितने वर्ष आपको इस धरती पर आये हुए होंगे, लगभग उतने ही वर्षों से यह धरती मेरा भी बोझ उठाये हुए घूम रही हैअंतर सिर्फ हमारी सोच में हैमुझे लगता है कि कुशिक्षा के कारण या अशिक्षा के कारण हम सब अपने अपने धर्म को (यह तो नहीं स्पष्ट करना पड़ेगा न कि यहां 'धर्म' का अर्थ'कर्तव्य' है?) नहीं समझ पा रहे हैं और इसीलिये हर कोई एक दूसरे के दुःख का कारण बन रहा है। 

 

            नंगे घूमना मेरा व्यक्तिगत अधिकार हो सकता है पर यदि इससे समाज में अन्य लोगों को हानि हो रही हो तो उनकी खातिर मुझे अपने इस अधिकार को अपने बैडरूम तक सीमित कर लेना चाहिये - यही मेरा धर्म है।  यह ठीक उसी प्रकार से है कि फुल वॉल्यूम पर गाना सुनना मेरा मूलभूत अधिकार होगा पर अगर मेरे पड़ोस में बच्चे बोर्ड की परीक्षाओं में व्यस्त हैं तो मुझे अपने इस अधिकार में कटौती करनी होगी।  तभी मैं अच्छे पड़ोसी का धर्म निभा पाऊंगा ।  यदि हम धर्म - अधर्म की, कर्तव्य - अकर्तव्य की विश्व की इस प्राचीनतम परिभाषा को समझ लें, हृदयंगम कर लें तो हम पुनः एक बार सही मार्ग पर चल निकलेंगे। पर समस्या ये है कि हमारे पाठ्यक्रम में यह शिक्षा कहीं है ही नहीं ।  और तो क्या कहें, धर्म का पाठ पढ़ाने को अपनी जीविका बनाने वाले पंडितों, पुरोहितों, कथा-वाचकों, शिक्षा-शास्त्रियों को भी यह जानकारी देने की आवश्यकता है, ऐसा मेरा अनुभव है।   

 

            आज जो कुछ हमारे सामने गड़बड़ियां दिखाई दे रही हैं, वह सब आपको और मुझे समान रूप से व्यथित करती हैं ।  मैं यथास्थितिवादी होता तो स स्थिति को पसन्द करता होता । परिवर्तन की आकांक्षा मुझे भी उतनी ही है जितनी आपको, परंतु वह परिवर्तन क्या हो, कैसा हो, इस पर बहस होनी आवश्यक है । अगर आपकी सोच के बारे में मेरा आकलन सही है तो आपको ये लगता है कि हमारे मनीषियों के मौलिक चिंतन में ही दोष है, उनकी विज़न ही शोषणकारी रही है  और हमें एक ऐसी नई व्यवस्था कायम करनी होगी जिसमें व्यक्ति पर कोई पाबंदी न हो, समाज में  पूर्ण लोकतंत्र हो।  यदि मैं बीच सड़क पर चलना चाहूं तो मुझे रोका टोका न जायेभले ही कोई वाहन आकर मुझे कुचल क्यों न देयदि कोई मुझे बीच सड़क पर चलने से मना करेगा तो मेरे पास कुछ रटे रटाये मुहावरे हैं ही । मैं उसे यथास्थितिवादी कहूंगा, शोषणकर्ता कहूंगा, प्रगति-विरोधी कहूंगा और जो जो भी मेरे मन में आयेगा, वह सब कहूंगा!

 

            परिवर्तन की आपकी आकांक्षा और सोच का मैं बहुत आदर करता हूं।  मेरा मानना है कि - लीक छोड़ तीनों चलें - शायर, सिंह, सपूतइसी लिये तो मैं आपसे कह रहा था कि कोई बेहतर विकल्प सामने रखिये - दुनिया उस पर विचार करेगी, यदि वह विकल्प व्यावहारिक हुआ तो उसे स्वीकार भी करेगी।  जिस-जिस क्रान्तिकारी चिंतक ने भी समाज को कुछ नया देने का प्रयास किया, हमारे समाज में उसे  महापुरुष मान कर सम्मान दिया गया है। पर बड़े दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आप मौजूदा विकृतियों को देख देख कर परेशान तो हो रहे हैं पर कोई हल सुझाने का आह्वान करो तो अपनी असमर्थता देख कर आप कटु हो जाते हैं। मैं बड़ी उत्कंठा से आपसे विकल्प  मांग रहा था पर आपको उसमें भी मैं दोषी नज़र आने लगा हूं । अब आप ही बताइये, मैं क्या करूं

 

            सही क्या है और गलत क्या है इसे जानने का मेरे पास तो एकमात्र फंडा यही है - "सामाजिक धर्म के पालन के मार्ग में यदि मेरा व्यक्तिगत धर्म आने लगे तो मुझे उसे भूलना होगा - यही सच्ची धार्मिकता है, यही मेरा वास्तविक कर्तव्य है।"

 

सुशान्त सिंहल

www.sushantsinghal.blogspot.com

 

7 टिप्‍पणियां:

  1. सुशांत जी आपको बताना चाहूँगा की आज तकनीकी बजह से आपकी एवं विनय जी की एक एक पोस्ट को ड्राफ्ट में डालना पड़ा इसलिए प्रकाशित नही कर पाया !! सो आप अन्यथा न ले!!
    और अपना सहयोग देते रहे !!
    अगर आपको को शिकायत नही है तो संपर्क करें!!

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  2. क्या बात है? कोई टिप्पणी प्रतिउत्तर में नहीं?

    आपके तर्क तो अकाट्य और सत्य हैं ही पर आपने कुतर्कों पर भी इतना बड़ा आलेख लिख कर अपने ब्लॉग और लेख को एक गंभीरता और गहराई दी है. इसके लिए आप प्रशंसा के पात्र है, साधुवाद!

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  3. या तो ये आलेख उन तक पहुंच नहीं पाया या संभव है, कुछ चिंतन-मनन चल रहा हो।

    सुशान्त सिंहल

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  4. भाई सिंहल जी,
    शायद ही कोई ब्लाॅगर होगा जो कहीं और व्यस्त न होगा। इस बीच आपके पास भी पूरा वक्त है कि डीसैक्सुअलाइज़ेशन, सामाजिकता और हृदय की विशालता वगैरहा पर खुलकर विचार कर लें और जो श्लोकादि ढूंढने हैं ढूंढ कर रख लें।

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  5. कुछ ऐसे ही विषयों पर चिंतन यहां भी हुआ है समय मिले तो पढ़ें- http://matukjuli.blogspot.com/2009/09/guru-shishya-sabandh-1.html

    http://matukjuli.blogspot.com/2009/09/guru-shishya-sabandh-2.html

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  6. धर्म का अर्थ - मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता (सदाचरण) ।
    व्यक्तिगत धर्म- सत्य, न्याय एवं नैतिक दृष्टि से उत्तम कर्म करना, व्यक्तिगत धर्म है ।
    सामाजिक धर्म- मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । ईश्वर या स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है ।
    धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस स्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
    धर्म को अपनाया नहीं जाता, धर्म का पालन किया जाता है । धर्म के विरुद्ध किया गया कर्म, अधर्म होता है ।
    व्यक्ति के कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म -
    राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
    धर्म सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक व अनन्त काल तक रहेगा ।
    धर्म एवं ‘उपासना द्वारा मोक्ष’ एक दूसरे आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है । ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
    राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है ।
    कृपया इस ज्ञान को सर्वत्र फैलावें । by- kpopsbjri

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  7. धर्म का अर्थ - मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता (सदाचरण) ।
    व्यक्तिगत धर्म- सत्य, न्याय एवं नैतिक दृष्टि से उत्तम कर्म करना, व्यक्तिगत धर्म है ।
    सामाजिक धर्म- मानव समाज में सत्य, न्याय एवं नैतिकता की स्थापना के लिए कर्म करना, सामाजिक धर्म है । ईश्वर या स्थिरबुद्धि मनुष्य सामाजिक धर्म को पूर्ण रूप से निभाते है ।
    धर्म संकट- सत्य और न्याय में विरोधाभास की स्थिति को धर्मसंकट कहा जाता है । उस स्थिति में मानव कल्याण व मानवीय मूल्यों की दृष्टि से सत्य और न्याय में से जो उत्तम हो, उसे चुना जाता है ।
    धर्म को अपनाया नहीं जाता, धर्म का पालन किया जाता है । धर्म के विरुद्ध किया गया कर्म, अधर्म होता है ।
    व्यक्ति के कत्र्तव्य पालन की दृष्टि से धर्म -
    राजधर्म, राष्ट्रधर्म, मनुष्यधर्म, पितृधर्म, पुत्रधर्म, मातृधर्म, पुत्रीधर्म, भ्राताधर्म इत्यादि ।
    धर्म सनातन है परमात्मा शिव से लेकर इस क्षण तक व अनन्त काल तक रहेगा ।
    धर्म एवं ‘उपासना द्वारा मोक्ष’ एक दूसरे आश्रित, परन्तु अलग-अलग विषय है । ज्ञान अनन्त है एवं श्रीमद् भगवद् गीता ज्ञान का सार है ।
    राजतंत्र में धर्म का पालन राजतांत्रिक मूल्यों से, लोकतंत्र में धर्म का पालन लोकतांत्रिक मूल्यों से होता है ।
    कृपया इस ज्ञान को सर्वत्र फैलावें । by- kpopsbjri

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