देश को ५४२ नालायकों की तुरंत आवश्यकता है। चयन होते ही आने वाली सात पीढ़ियों तक का जुगाड़ होने की पूरी गारंटी है। वेतन पर कोई आयकर नहीं, जब मर्ज़ी, जितना मरज़ी वेतन स्वयं बढ़ा लेने की सुविधा उपलब्ध है। काम की कोई जिम्मेदारी नहीं है। ऑफिस में आओ, या न आओ, आपकी इच्छा पर निर्भर करेगा। शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है, अंगूठा छाप भी चलेगा। रिश्वत लेने देने की पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी इस बारे में विशेषाधिकार आपकी रक्षा करेगा ।
एकमात्र अनिवार्य अर्हता है - जनता को अपनी लच्छेदार बातों से, धन बल से, बाहु बल से - येन-केन प्रकारेण बहला कर, फुसला कर, आतंकित करके, प्रताड़ित करके, बूथ लूट कर, घपलेबाजी करके - यानि किसी भी प्रकार से वोट हासिल करने होंगे। यदि आप हत्या, बलात्कार आदि-आदि किसी जुर्म में जेल की सज़ा काट रहे हैं तो भी कोई विशेष दिक्कत नहीं है - आप अपने गुर्गों की सहायता से चयन प्रकिया में भाग ले सकेंगे।
चयनित व्यक्ति का मुख्य कार्य भाषण देना, सार्वजनिक अभिनंदन कराना, मालायें पहनना, जब तब विदेश यात्रा करना, लोगों के अंट-शंट काम निपटाने में उनकी मदद करना आदि रहेंगे। आदर्शवादी आवेदन करने की चेष्टा / धृष्टता न करें, उनका आवेदन पत्र प्रथम दृष्टया निरस्त कर दिया जायेगा।
इच्छुक व्यक्ति २०-३० लाख रुपये पार्टी चंदे के रूप में जेब में डाल कर लाइन में लग जायें।


ए सर जी! ई चंदे वाली शर्त हटा दीजिए और मेरा एप्लीकेशन आप एक्सेप्टिए तो तुरंत.
प्रत्युत्तर देंहटाएंकितना सुख देती है ना ये नालायकी ...अभी से लड़ मर रहे है
प्रत्युत्तर देंहटाएंटांग खिंचाई शुरु हो गयी है, मुखौटे लग चुके हैं, मुह में राम नाम पीछे छुरियां तैयार हो गयी हैं। बस इंतजार खत्म आने ही वाले हैं दलबल के साथ।
प्रत्युत्तर देंहटाएंइस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
प्रत्युत्तर देंहटाएंआपके हिसाब से सारे के सारे 542 सांसद नालयक हैं? तो फिर तो आपके हिसाब से भारत का लोकतंत्र भी नालायक है। क्या आपने कभी लोकसभा और राज्यसभा की कार्यवाही को पूरा देखा है? क्या आप को पता है कि अधिकांश सांसद कितना काम करते हैं? अगर सब नालायक हैं तो फिर लायक कौन है और ये भी बता दीजिये की लोकतंत्र के लिये आप ही ने क्या कर दिया है। कभी मौका लगे तो संसद की लाइब्रेरी जाकर पढियेगा कि अधिकांश नेता आप जैसे लोगों से बहुत ज्यादा काम करते हैं।
प्रत्युत्तर देंहटाएंनेताओं को कोसना मध्यम वर्ग का फैशन बन गया है लेकिन उस ठीक करने का या उसमें योगदान देने की बारी पर भाग लेते हैं।
सिंहल साहब! लोग लाइन लगाए खड़े हैं और चयन न होने पर रो भी रहे हैं।
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