इस महफिल में सुबह-शाम, यादों के मेले लगते हैं
बिछुड़ गये हैं फिर भी सब, हंसते-गाते-मिलते हैं।
जब से www.thesaharanpur.com वेबसाइट पर महफिलें सजनी शुरु हुई हैं, एक मौन क्रांति की आहट साफ सुनाई देने लगी है। ऐसे हज़ारों युवा हैं जो शहर की नर्क पालिका (मेरा मतलब था - नगरपालिका !) और कुछ गन्दगीपसन्द नागरिकों के हाथों शहर की दुर्दशा देख कर अकुलाहट अनुभव करते रहे हैं पर रास्ता नहीं सूझता था कि क्या करें। कहने को तो www.thesaharanpur.com मात्र एक वेबसाइट लगती है पर वास्तव में यह एक रचनात्मक आंदोलन है जिसमें सात समुन्दर पार बैठे सहारनपुर वासी भी उत्साह के साथ जुड़ने लगे हैं और जहां तक बन पड़े, सहयोग करने को तत्पर हो रहे हैं।
कौन कहता है कि समाज में अच्छे लोगों का अकाल पड़ गया है? सच तो यह है कि अच्छे लोग बहुमत में होते हैं, सिर्फ बिखरे हुए रहते हैं, दिशा विहीन और उत्साह विहीन रहते हैं। यदि कोई उनके आगे एक लक्ष्य और उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग स्पष्ट कर दे तो उनकी निराशा, उत्साहविहीनता, अलस सब छू मंतर हो जाते हैं।

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Bahut badhai ho. Nahi, samaaz mein achhe logon ka aakaal nahi hai, bus hamari nazren achhe logon tak jaldi nahi pahunchti hai.
प्रत्युत्तर देंहटाएंIs post per comment number 63 mein ek comment aapke liye bhi hai.
rgds.