मित्रों,
"सिर्फ अम्मा ही क्यों ? पिताजी क्यों नहीं?" हमारे अनेक पाठकों ने हमारे सम्मुख प्रश्न किया है कि आप www.the-saharanpur.com/amma.html पर केवल "अम्मा" को ही समर्पित रचनायें छाप कर क्यों रुक गये हैं? क्या हमारे जीवन में पिता का स्थान अम्मा से कमतर होता है? अब आप ही बताइये, हम अपनी दो आंखों में किसे से ज्यादा महत्वपूर्ण मान सकते हैं भला? पर हमारे सुधि पाठकों की यह प्यार भरी शिकायत जायज़ है और इसीलिये आज हम एक अद्भुत काव्य रचना से अपने पूर्वजों को प्रणाम करने का यह क्रम पुनः शुरु कर रहे हैं। उम्मीद है कि आप लोग अपने पूज्य पिता श्री के प्रति अपने भाव-पुष्प समर्पित करने में पीछे नहीं रहेंगे। तो मित्रों, ये रही इस अभियान की प्रथम रचना !
मेरे बाबूजी !
सौ सुमनों का एक हार हैं मेरे बाबूजी,
बाहर भीतर सिर्फ प्यार हैं मेरे बाबूजी !
सारे घर को जिसने अपने स्वर से बांध रखा,
उस वीणा का मुख्य तार हैं मेरे बाबूजी !
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यदि आपने अम्मा को समर्पित कवितायें जो हमें प्राप्त हुईं, अभी तक न पढ़ी हों तो आप यहां पढ़ सकते हैं। चाहें तो अपनी कविता भी भेज सकते हैं।
Editor
The Saharanpur Dot Com
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जिधर को चल दें, चलता उधर को जीवन भी
प्रत्युत्तर देंहटाएंमेरे घर की पतवार हैं मेरे बाबू जी
http://rajey.blogspot.com/
स्वागत, इस आयोजन का भी !
प्रत्युत्तर देंहटाएंसद्विचार है |
आपने जो पूरी रचना पढने के लिए लिंक दिया है, वहाँ Error 404 (Not Found) दिखा रहा है, कृपया जाँच लें|
प्रत्युत्तर देंहटाएंi hope you will help me.
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