गुरुवार, 5 मार्च 2009

मांसाहार नहीं, शाकाहार स्वास्थ्यकर है।

मांसाहार या शाकाहारबहस बहुत उपयोगी है और मनोरंजक भीमैं स्वयं पूर्णतः शाकाहारी हूं पर मेरे विचार में मैं शाकाहारी इसलिये हूं क्योंकि मेरा जन्म एक शाकाहारी माता-पिता के घर में हुआ और मुझे बचपन से यह संस्कार मिले कि शाकाहार मांसाहार की तुलना में बेहतर है।  आज मैं स्वेच्छा से शाकाहारी हूं और मांसाहारी होने की कल्पना भी नहीं कर पाता हूं। 

 मुझे जिन कारणों से शाकाहार बेहतर लगता है, वह निम्न हैं:-

 .     मैने विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते पढ़ा है कि ऊर्जा का प्राथमिक स्रोत सूर्य है। पेड़-पौधे फोटो-सिंथेसिस के माध्यम से अपना भोजन बना सकते हैं पर जीव-जंतु नहीं बना सकते। ऐसे में वनस्पति से भोजन प्राप्त कर के हम प्रथम श्रेणी की ऊर्जा प्राप्त कर लेते हैं।

 .   दुनिया के जिन हिस्सों में वनस्पति कठिनाई से उत्पन्न होती है - विशेषकर रेगिस्तानी इलाकों में, वहां मांसाहार का प्रचलन अधिक होना स्वाभाविक ही है।

 .   आयुर्वेद जो मॉडर्न मॅडिसिन की तुलना में कई हज़ार वर्ष पुराना आयुर्विज्ञान है - कहता है कि विद्यार्थी जीवन में सात्विक भोजन करना चाहिये।  सात्विक भोजन में रोटी, दाल, सब्ज़ी, दूध, दही आदि आते हैं।  गृहस्थ जीवन में राजसिक भोजन उचित है।  इसमें गरिष्ठ पदार्थ - पूड़ी, कचौड़ी, मिष्ठान्न, छप्पन भोग आदि आते हैं।  सैनिकों के लिये तामसिक भोजन की अनुमति दी गई है।  मांसाहार को तामसिक भोजन में शामिल किया गया है। राजसिक भोजन यदि बासी हो गया हो तो वह भी तामसिक प्रभाव वाला हो जाता है, ऐसा आयुर्वेद का कथन है। 

             भोजन के इस वर्गीकरण का आधार यह बताया गया है कि हर प्रकार के भोजन से हमारे भीतर अलग - अलग प्रकार की मनोवृत्ति जन्म लेती है।  जिस व्यक्ति को मुख्यतः बौद्धिक कार्य करना है, उसके लिये सात्विक भोजन सर्वश्रेष्ठ है।  सैनिक को मुख्यतः कठोर जीवन जीना है और बॉस के आदेशों का पालन करना होता है। यदि 'फायर' कह दिया तो फयर करना है, अपनी विवेक बुद्धि से, उचित अनुचित के फेर में नहीं पड़ना है।  ऐसी मनोवृत्ति तामसिक भोजन से पनपती है, ऐसा आयुर्वेद का मत है।

      यदि आप कहना चाहें कि इस वर्गीकरण का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है तो मैं यही कह सकता हूं कि बेचारी मॉडर्न मॅडिसिन अभी प्रोटीन - कार्बोहाइड्रेट - वसा से आगे नहीं बढ़ी है।  जिस दिन भोजन व मानसिकता का अन्तर्सम्बन्ध जानने का प्रयास करेगी, इस तथ्य को ऐसे ही समझ जायेगी जैसे आयुर्वेद व योग के अन्य सिद्धान्तों को समझती जा रही है।  तब तक आप चाहे तो प्रतीक्षा कर लें, चाहे तो आयुर्वेद के सिद्धान्तों की खिल्ली भी उड़ा सकते हैं।

             जब हम मांसाहार लेते हैं तो वास्तव में पशुओं में कंसंट्रेटेड फॉर्म में मौजूद वानस्पतिक ऊर्जा को ही प्राप्त करते हैं क्योंकि इन पशुओं में भी तो भोजन वनस्पतियों से ही आया है।  हां, इतना अवश्य है कि पशुओं के शरीर से प्राप्त होने वाली वानस्पतिक ऊर्जा सेकेंड हैंड ऊर्जा है।

      यदि आप मांसाहारी पशुओं को खाकर ऊर्जा प्राप्त करते हैं तो आप थर्ड हैंड ऊर्जा पाने की चेष्टा करते हैं। वनस्पति से शाकाहारी पशु मेंशाकाहारी पशु से मांसाहारी पशु में और फिर मांसाहारी पशु से आप में ऊर्जा पहुंचती है।  हो सकता है कि कुछ लोग गिद्ध, बाज, गरुड़ आदि को खाकर ऊर्जा प्राप्त करना चाहें।  जैसी उनकी इच्छावे पूर्ण स्वतंत्र हैं।

             एक तर्क यह दिया गया है कि पेड़-पौधों को भी कष्ट होता है।  ऐसे में पशुओं को कष्ट पहुंचाने की बात स्वयमेव निरस्त हो जाती है।  इस बारे में विनम्र निवेदन है कि हम पेड़ से फल तोड़ते हैं तो पेड़ की हत्या नहीं कर देते। फल तोड़ने के बाद भी पेड़ स्वस्थ है, प्राणवान है, और फल देता रहेगा।  आप गाय, भैंस, बकरी का दूध दुहते हैं तो ये पशु न तो मर जाते हैं और न ही दूध दुहने से बीमार हो जाते हैं।  दूध को तो प्रकृति ने बनाया ही भोजन के रूप में है।  पर अगर हम किसी पशु के जीवन का अन्त कर देते हैं तो अनेकों धर्मों में इसको बुरा माना गया है।  आप इससे सहमत हों या न हों, आपकी मर्ज़ी।

             चिकित्सा वैज्ञानिकों का यह भी मानना है कि प्रत्येक शरीर जीवित कोशिकाओं से मिल कर बनता है और शरीर में जब भोजन पहुंचता है तो ये सब कोशिकायें अपना-अपना भोजन प्राप्त करती हैं व मल त्याग करती हैं।  यह मल एक निश्चित अंतराल पर शरीर बाहर फेंकता रहता है। यदि किसी जीव की हत्या कर दी जाये तो उसके शरीर की कोशिकायें मृत शरीर में मौजूद नौरिश्मेंट को प्राप्त करके यथासंभव जीवित रहने का प्रयास करती रहती हैं।  यह कुछ ऐसा ही है कि जैसे किसी बंद कमरे में पांच-सात व्यक्ति ऑक्सीजन न मिल पाने के कारण मर जायें तो उस कमरे में ऑक्सीजन का प्रतिशत शून्य मिलेगा।  जितनी भी ऑक्सीजन कमरे में थी, उस सब का उपभोग हो जाने के बाद ही, एक-एक व्यक्ति मरना शुरु होगा।  इसी प्रकार शरीर से काट कर अलग कर दिये गये अंग में जितना भी नौरिश्मेंट मौजूद होगा, वह सब कोशिकायें प्राप्त करती रहेंगि और जब सिर्फ मल ही शेष बच रहेगा तो कोशिकायें धीरे धीरे मरती चली जायेंगी।  ऐसे में कहा जा सकता है कि मृत पशु से नौरिश्मेंट पाने के प्रयास में हम वास्तव में मल खा रहे होते हैं।  हो सकता है, यह बात कुछ लोगों को अरुचिकर लगे।  मैं उन सब से हाथ जोड़ कर क्षमाप्रार्थना करता हूं। पर जो बायोलोजिकल तथ्य हैं, वही बयान कर रहा हूं। 

             भारत जैसे देश में, जहां मानव के लिये भी स्वास्थ्य-सेवायें व स्वास्थ्यकर, पोषक भोजन दुर्लभ हैं, पशुओं के स्वास्थ्य की, उनके लिये पोषक व स्वास्थ्यकर भोजन की चिन्ता कौन करेगा?   घोर अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों में रहते हुए, जहां जो भी, जैसा भी, सड़ा-गला मिल गया, खाकर बेचारे पशु अपना पेट पालते हैं।  उनमें से अधिकांश घनघोर बीमारियों से ग्रस्त हैं।  ऐसे बीमार पशुओं को भोजन के रूप में प्रयोग करने की तो कल्पना भी मुझे कंपकंपी उत्पन्न कर देती है।  यदि आप फिर भी उनको भोजन के रूप में बड़े चाव से देख पाते हैं तो ऐसा भोजन आपको मुबारक।  हम तो पेड़ - पौधों पर छिड़के जाने वाले कीटनाशकों से ही निबट लें तो ही खैर मना लेंगे ।

 उक्त विवेचन में यदि किसी भी व्यक्ति को कुछ अरुचिकर अनुभव हुआ हो तो मुझे हार्दिक खेद है।

 

सुशान्त सिंहल

 www.sushantsinghal.blogspot.com

11 टिप्‍पणियां:

  1. प्रिय सुशांत, ब्लौग http://yaadonkaaaina.blogspot.com पर सलीम मियां की मांसाहार के पक्ष में लिखी गयी पोस्ट के जवाब में मैंने जो लघु टिप्पणी की थी उसके फलस्वरूप उस ब्लौग पर एक अच्छी बहस चल पडी. सलीम मियां ने मेरी पोस्ट के जवाब में दूसरी पोस्ट की जिसका जवाब समयाभाव और यात्रा के होने के कारण मैं नहीं कर पाया. लेकिन आपकी पोस्ट पढने के बाद मुझे लग रहा है कि इससे बेहतर जवाब देना मुश्किल है. शाकाहार के वैज्ञानिक पक्ष पर इतना अच्छा लिखने के लिए मेरी बधाई स्वीकार करें.

    उत्तर देंहटाएं
  2. one more thing, i am also a great photo-enthusiast. i have a nikon fm-10 slr and a kodak 7mp semi-professional camera. your blog features great content for amateurs. i must learn a lot.

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत अच्‍छे विश्‍लेषण के साथ लिखा गया है यह आलेख ... मुझे इसलिए भी अच्‍छा लगा ... क्‍योंकि मै भी शाकाहारी हूं।

    उत्तर देंहटाएं
  4. Dear Nishant Mishra,

    Glad to hear from you. I also hope that the topic of veg/nonveg is closed now. I had read on a T-Shirt : MAKE NO BONES ABOUT IT. SOONER OR LATER, WE'LL ALL BE VEGETARIANS.

    Would like to know more about you. Please feel free to interact as I enjoy meeting - even if on net - with like-minded people.

    Sushant Singhal

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुशांत जी, मैं आपकी बात से सहमत नही हूं.... जो तर्क आपने दिये है वो सही नही है!

    * आपने कहा की दही सात्विक भोजन में आता है लेकिन दही तो "मासांहार" है।

    हम सब जानते है की दही में बैक्टिरिया होते है जो दुध को फ़ाडकर उसको दही में परीवर्तित करते है...लगभग १०० ग्राम दही में कई लाख बैक्टिरिया होते है।

    * एक बात बताइये अगर दुनिया की पुरी आबादी जो इस वक्त
    World Population 6,775,825,447
    07:25 GMT (EST+5) Aug 06, 2009

    सिर्फ़ शाकाहार पर जीवित रहने लगे तो क्या होगा कभी सोचा है आपने....इतने लोगो को कहां से खिलाओगे?????? और दुनिया में जब जानवर खाये नही जायेंगे उनकी बढती आबादी को कैसे खिलाओगे?????


    वैसे ही दुनिया में खेती के लिये ज़मीन दिन द दिन कम होती जा रही है.....

    मुझे देर हो रही है...ज़रूरी काम आ निकला है तो बाकी सवाल-जवाब बाद में....

    उत्तर देंहटाएं
  6. kashif ji, dahi shakahar mai hi ata hai baktiriya mansahar nahi hai kyoki ye to sukshama roop se partek bhojya padaarth mai hote hai.apko abhi pata nahi hain ki janwar ka ek kilo mans tayar karne main 40 kg shakahar ka vyay hota hain. sari duniya shakahari ho jaye to 6 arab to kya 40 arab logo ka pet bhara ja sakta hai.

    उत्तर देंहटाएं
  7. kashib ji , dahi shakahar hi hota hai.baktiriya to shkshama roopse pertek bhojya padarto main hota hai. apko abhi malum nahi ki 1kg mans tayar karne mai 40 kg shkahar ka vyay hota hai. agar sari duniya shakahari ho jaye to 6 arab to kya 40 arab logo ka pet bhara ja sakta hain.

    उत्तर देंहटाएं
  8. सुशांत सिंघल आप अच्छा लिखते हें आगे भी लिखते रहे . सराब मांस अंडा गुटका सिगरेट बीडी पानमसाला या जो सरीर के लिए हानिकारक हो या जिस सामान पर उसके घटकों की जानकारी न हो उनके TV अख़बार patrika me प्रचार पर रोक लगे हमें एक स्वस्थ विश्व की और बढ़ना हे
    धन्यवाद
    प्रवीण
    parveen.1957@gmail.com

    उत्तर देंहटाएं
  9. kashif hansi ayi apki baat padh kr ap nature ko challng kr rhe hain nature ke age 6 arab kisi sukshm kal lakhwa bhag hoga ab aap soch lo agr sab vegetrian ho jaye to kitne log kha skte hain nature se nature ka khjana koi apke ghar me pda huya gehun ka drm nhi h jo agar 4 logo ko jayda khila dogo to khali ho jayega ye nature ka drm h ap iske jitna bda hone ki kalpna krenge ye usse lakho guna jada hoga

    उत्तर देंहटाएं

आपके विचार जानकर ही कुछ और लिख पाता हूं। अतः लिखिये जो भी लिखना चाहते हैं।