सोमवार, 22 अक्तूबर 2012

चलो, काश्मीर चलें ?



                मार्च के प्रथम सप्ताह की बात है, रात को मोबाइल पर एस.एम.एस. की टिक-टिक हुई। देखा तो एक संदेश था जिसमें “दो रात – तीन दिन” के मनाली टूर के बारे में जानकारी भेजी गई थी।  मैं अपने फोन पर डी.एन.डी. पंजीकरण के बावजूद यदा कदा आ टपकने वाले promotional message बिना पढ़ने का कष्ट किये ही रद्दी की टोकरी के हवाले कर दिया करता हूं पर यह संदेश मेरे एक टूर आर्गेनाइज़र मित्र पंकज गोयल द्वारा भेजा गया था अतः कुछ लिहाज जरूरी हो गया और मैने एक बार उसे पढ़ा और अपनी भावनाओं को डिलीट बटन के माध्यम से सुन्दर अभिव्यक्ति दे डाली।
इस घटनाक्रम की जानकारी मैने अपनी पत्नी को दी जो हमारे डबल बैड के अपने लिये आरक्षित आधे हिस्से में, मोबाइल लिये बैठी बड़े मनोयोग से कोई वीडियो गेम खेल रही थी और साथ ही साथ  एकता कपूर के सड़े हुए धारावाहिकों की टी.आर.पी. बढ़ाने के लिये टी.वी. भी खोले बैठी थी।  खेल का एक राउंड पूरा हुआ और टी.वी. पर एक सैनिटरी नैपकिन का विज्ञापन शुरु हुआ जिसमें नाव में बैठी लड़कियों के हाथ से नैपकिन का पैक उछल कर नदी में गिर जाता है और वह नैपकिन पूरी की पूरी नदी को सुखा डालता है। रिमोट से टी.वी. का गला घोंटते के बाद श्रीमती जी मेरी ओर उन्मुख हुईं और पूछा – “कौन सी तारीख का टूर है?  चलते हैं।“  मैं परेशान क्योंकि एस.एम.एस. तो अब स्वर्ग सिधार चुका था और उसमें टूर की क्या तारीख थी, इस पर मैने ध्यान ही नहीं दिया था। मैने बताया कि एस.एम.एस. तो मैने delete कर दिया।
“चलना है तो फोन करके पंकज से पूरी डिटेल ले लें?”   मैने पूछा ।
अपनी वामांगिनी से एन.ओ.सी. प्राप्त होते ही मैने पंकज को फोन लगाया। टूर के बारे में पूछा तो बोला, “ भैया, टूर को छोड़ो! वह तो फुल हो गया है।  उसमें अधिकांशतः एक ही कंपनी के कर्मचारियों के परिवार हैं, आप लोगों को उस ग्रुप के साथ घूमने में मज़ा नहीं आता। अगर आप दोनों की इच्छा हो तो हम दोनों परिवार अलग से चले चलते हैं।  अकेले तो हमारा भी प्रोग्राम नहीं  बन पाता है।“
पंकज मुझसे लगभग २० वर्ष छोटा है, अतः अगर मुझे अंकल जी कहता तो भी मैं उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकता था पर वह मुझे बड़े भाई का दर्ज़ा देता है। उसकी पत्नी चीनू की भी मेरी पत्नी के साथ खूब अच्छी पटरी बैठती है। दोनों के पास ढाई वर्ष का एक बच्चा है।  हम दोनों परिवार कभी एक साथ घूमने नहीं गये थे परन्तु हमें इतना विश्वास था कि अगर साथ-साथ जायेंगे तो सब का खूब मन लगेगा। छोटे बच्चे के कारण अकेले वह भी नहीं जाना चाहते थे और हमारी भी यही इच्छा रहती है कि कम से कम एक परिवार तो अवश्य ही साथ हो। अगर कभी आपस में किसी बात पर झगड़ पड़ें तो कोई बीच – बचाव कराने वाला तो हो!
फोन पर पंकज से मनाली चलने की बात तय करते समय मेरी पत्नी ने केवल एक शर्त रखी कि नवरात्रों से पहले-पहले वापिस आना होगा क्योंकि वह अखंड ज्योत जलाती हैं। अगले दिन पंकज का फोन आया कि अगर हम दोनों परिवारों को ही चलना है तो मनाली ही क्यों, कश्मीर क्यों नहीं !  हमने फिर सोचा-विचारा कि बालक बात तो सही कह रहा है। मनाली तो कभी भी चले जायेंगे, कश्मीर जाने का प्रोग्राम थोड़ा कठिनाई से बनता है। क्यों न हो ही आयें। छः रात और सात दिन के लिये निकल चलते हैं।  इस यात्रा की सारी तैयारियां करने की जिम्मेदारी हमने पंकज को ही सौंप दी क्योंकि बन्दा टूर आर्गेनाइज़र जो ठहरा।  कहां ठहरेंगे, कहां कहां घूमने जायेंगे, क्या-क्या देखेंगे, इसका पूरा विस्तृत विवरण उधर पंकज ने तैयार करना आरंभ किया और मैने Google Earth और wikitravel पर जाकर कश्मीर के बारे में ऐसे पढ़ाई करनी आरंभ कर दी मानों बोर्ड की परीक्षा सर पर खड़ी हो और मास्टर जी ने बताया हो कि कश्मीर का चैप्टर इंपोर्टेंट है। दरअसल, मैं चाहता हूं कि जब गन्तव्य स्थल पर पहुंचूं तो लोगों से पूछ – पूछ कर रास्ते न टटोलने पड़ें। बिल्कुल लोकल बाशिन्दे की तरह से पूर्ण आत्मविश्वास के साथ घूम सकूं!  जो कुछ पढ़ कर गया, उसका वास्तविकता से तुलनात्मक अध्ययन करते चलना मेरी आदत बन चुका है और मुझे इसमें बहुत आनन्द आता है।  हर किसी को कोई न कोई बीमारी होती ही है, सो मुझे भी ये बीमारी है।
       एक बात जो मोटे तौर पर हमने पहले ही तय कर ली थी, वह ये कि हम हवाई यात्रा नहीं करेंगे बल्कि सड़क मार्ग से जम्मू से श्रीनगर जायेंगे।  मुझे पटनीटॉप और जवाहर टनल का बहुत क्रेज़ था।  घुमक्कड़ साइट पर पटनीटॉप के हसीन नज़ारे और कुद के पतीसे के बारे में पढ़ ही चुका था अतः इन सबको ’मिस’ करने का मन नहीं था। 
तीन दिन बाद पंकज गोयल का फोन आया कि रिज़र्वेशन हो गया है, एक फोर्ड फियेस्टा टैक्सी भी जम्मू स्टेशन पर हमारी इंतज़ार करेगी जो हमें छः दिन बाद वापिस जम्मू स्टेशन पर ही छोड़ेगी।  कश्मीर में कहां ठहरना है यह वहीं पहुंच कर देखा जायेगा। होटल ढूंढने में दिक्कत होने की संभावना नहीं थी क्योंकि कश्मीर में मार्च ऑफ सीज़न माना जाता है।  उम्मीद थी कि सौदेबाजी करके अच्छा और सस्ता होटल मिल ही जायेगा। यदि सौदेबाजी करने की कहीं कोई अन्तर्राष्ट्रीय प्रतियोगिता होती हो तो आप लोग कृपया मुझे अवश्य ही सूचित करें। मैं उस प्रतियोगिता के लिये पंकज का नामांकन कराना चाहूंगा।  सॉलिड बार्गेनर बन्दा है।  मुझे तो शक है कि वह रेल और बस का टिकट खरीदते समय भी थोड़ी बहुत सौदेबाजी कर ही लेता होगा।  दो-तीन वर्ष पहले दिल्ली के एक लैब में वह और मैं साथ-साथ गये थे जहां हमें दो सी-टी स्कैन कराने थे। 4200 रुपये में एक स्कैन बताया गया पर आधा घंटे की सौदेबाजी के बाद 3800 रुपये में दो सी-टी स्कैन पर सौदा पट गया देख कर मेरी तो आंखें फटी की फटी रह गई थीं! उसका यह दुर्लभ गुण हमारी पूरी यात्रा में बहुत बहुमूल्य सिद्ध हुआ।  हमने समझदारी का एक काम और भी किया ।  वह ये कि संपूर्ण यात्रा की अवधि के लिये खजांची की पदवी पंकज को सौंप दी। आरक्षण से लेकर पानी की बोतल खरीदने तक सारा खर्च पंकज के हाथों से कराया जायेगा और बाद में जितना भी खर्च हुआ होगा, उसे आधा – आधा बांट लेंगे।         
       बर्फ से ढके पहाड़ों पर यात्रा करनी थी अतः मैने श्रीमती जी से कहा कि सिर के लिये टोपी  से लेकर पैर के लिये मौजे तक ऊनी वस्त्रों का प्रबन्ध करना होगा। पर वह इस हिसाब से तैयारी कर रही थीं जैसे अंतराष्ट्रीय सौन्दर्य प्रतियोगिता में भाग लेने जा रही हों।  फेशियल, मैनिक्योर, पैडिक्योर तक तो फिर भी ठीक था, पर एक शाम वह अपने हाथों - पैरों पर ढेर सारा गाढ़ा सा चिपचिपा गर्म पदार्थ लेप कर मेरे पास आ बैठीं और एक सूती कपड़ा और संडासी देकर कहा कि इस कपड़े को उनके बांह पर संडासी से रगड़ – रगड़ कर ठीक से चिपकाऊं। मरता क्या न करता !  आदेश हुआ था तो पालन तो करना ही था।  जब कपड़ा ठीक से चिपक गया तो बोलीं, “शाबाश !  अब इस कपड़े का एक सिरा पकड़ कर झटके से उखाड़ डालो।  अपनी तो हवा गोल! कोई आपके हाथ में पिस्तौल देकर कहे कि मुझे ’ठां’ कर दो, तो क्या आप उसे खट से ’ठां’ कर देंगे?  अरे, और किसी को तो जाने दें, आप अपनी धर्मपत्नी को भी ’ठां’ नहीं कर सकते जिसको ’ठां’ करने के हसीन सपने आप कभी कभी, चुपके-चुपके देख लिया करते होंगे।
“ये कैसे धर्मसंकट में डाल दिया, देवि !  मैं तुम्हें इतना कष्ट देने की तो स्वप्न में भी नहीं सोच सकता।“ मैने चेहरे पर ऐसी दर्द की लकीरें खींची जैसी दाढ़ के दर्द के समय स्वाभाविक रूप से आया करती हैं।  पिछले हफ्ते दांत में दर्द हुआ भी था, उसकी स्मृति से वैसा ही चेहरा बनाने में काफी सहायता भी मिली।  पर पत्नी बोली, “28 साल से आपको झेल रही हूं, आपकी रग-रग से वाकिफ़ हूं।“  अपना मुंह दूसरी ओर घुमा कर और कस कर दांत भींच कर बोलीं – “हे मेरे बेदरदी बालमा ! चलो, खींचो! बस, मैने भी दांत पीसते हुए कपड़ा त्वचा से ऐसे खींच दिया मानों कपड़ा नहीं, हाथ ही जड़ से उखाड़ने की तैयारी हो।  वाह, क्या बात है! अन्दर से ऐसी हसीन, बिल्कुल मक्खन जैसी रोमरहित त्वचा निकल कर आई कि बस, क्या बताऊं !  मेरी उत्सुकता शांत करते हुए उन्होंने बताया कि इस प्रक्रिया को हिंदी में ’वैक्सिंग’ कहते हैं। त्वचा से बाल गायब हो जाते हैं पर साली वैक्सिंग होती बहुत पेनफुल है।   मैने कहा भी कि इतना कष्ट उठाने की क्या जरूरत है, वहां सिर से लेकर पैर तक गर्म कपड़ों से ढंकी रहने वाली हो, फिर तुम्हारे इस कमल-कोमल-किसलय रूप की अद्‌भुत छटा को कौन निहारने जा रहा है? श्रीमती जी ने शरमाने का अभिनय करते हुए कहा,  “अरे, ये सब आपके ही लिये तो कर रही हूं !   शादी के 28 साल बाद ही सही, पर जा तो कश्मीर रहे हैं ना!  सुना है, बड़ी रोमांटिक जगह है।“  घबराहट में हमारे मुंह से निकला, “तुम्हारे तो इरादे बड़े खतरनाक लग रहे हैं। क्यों मुझे terrorize क्यों कर रही हो?”  दरअसल, कुछ ही दिन पहले मैने लेक्सिकोग्राफी की एक किताब में पढ़ा था – “Beauty is a power by which a woman charms a lover and terrifies a husband!”  पर मन ही मन अपुन बहुत परसन्न भये ! कश्मीर में लाटरी जो लगने जा रही थी!      
बस, ऐसे ही यात्रा की तैयारियां करते करते हमारे प्रस्थान की नियत तिथि 15 मार्च आ गई और हम दोनों (अर्थात्‌ मैं और मेरी पत्नी) एक अटैची और चार बैग के साथ साइकिल रिक्शा पर लदे-फदे रात को 7.45 पर सहारनपुर स्टेशन पर पहुंच गये जहां से हमें शालीमार एक्सप्रेस जम्मू तक लेकर जाने वाली थी।  पंकज गोयल मय बाल-बच्चे हमें प्लेटफार्म पर पूर्व नियत ओवरब्रिज के नीचे खड़े मिल गये।  उनके पास दस बैग व तीन अटैची देख कर मैने पूछा कि कश्मीर में ही शिफ्ट करने का प्लान बना लिया है क्या? चीनू बोली, “नहीं भैया! छोटे बच्चे का साथ हो तो इतना सामान तो हो ही जाता है!  बल्कि, पंकज ने दो बैग तो घर पर ही रखवा दिये हैं ।  मुझे तो डर है कि ट्रेन के टिकट कहीं उन्हीं में न रखे रह गये हों!” इतना सुनना था कि मेरी पत्नी तो माथा पकड़ कर अटैची पर ही बैठ गई और पंकज ने अपनी पत्नी के कंधे पर टंगे काले रंग के बैग पर जोर से झपट्टा मारा, चेन खींच कर खोली और पाकिट में से कुछ कागज़ बाहर निकाल कर उलटने – पुलटने लगा !  टिकट मिल गये तो उसने इतनी जोर से राहत भरी सांस ली कि मुझे कोयले के इंजन द्वारा झटके से भाप निकाले जाने की स्मृति मन-मस्तिष्क में कौंध गई। हमारी श्रीमती जी की भी जान में जान आई!  अविश्वास में गर्दन हिलाते हुए बोली, “अभी तो शुरुआत है, आगे – आगे देखिये होता है क्या!”    
मैने पंकज से पूछा, “कोच नंबर क्या है?  जहां अपना डब्बा आकर रुकेगा, वहीं चल कर खड़े होते हैं, इतने सामान के साथ तो भागा भी नहीं जा सकता। पंकज ने कुली को रोक कर पूछा कि
C-6 कोच कहां पर आयेगी? हमें गाड़ी में चढ़ाने का क्या लोगे?  मैं अपनी सांस रोक कर सौदेबाजी का पहला शानदार नमूना देखने के लिये खुद को तैयार कर रहा था परन्तु तभी घोषणा हो गई कि शालीमार एक्सप्रेस प्लेटफार्म 6 पर आ रही है।  अब सौदेबाजी का समय शेष नहीं रह गया था। कुली ने 300 रुपये बोले, पंकज ने 100 रुपये बताये !  साथ में, यह और जोड़ दिया कि गाड़ी आ गई है, अब कहां दूसरा ग्राहक ढूंढते फिरोगे? जितना मिल रहा है, जेब में डालो वरना 100 से भी जाओगे!  कुली ने फाड़ खाने वाली दृष्टि से पंकज को देखा पर फिर हालात की गंभीरता को परख कर 200 रुपये कहते हुए सामान अपनी हाथ ठेली पर रखना शुरु कर दिया। गाड़ी प्लेटफार्म पर लगते ही सामान और हम सबको अन्दर ठेल दिया गया। 
कोच नं० C-6 में प्रवेश कर के, मेरी पत्नी ने पूछा कि कौन – कौन सी बर्थ हैं तो पंकज का जवाब आया – “20 – 21” |  मैने पूछा “और बाकी दो?” पंकज ने रहस्यवाद के कवि की सी भाव भंगिमा दोनों महिलाओं की ओर डाली और मेरे कान के पास आकर धीरे से बोला, “अभी दो ही कन्फर्म हुई हैं, बाकी दो यहीं गाड़ी में ले लेंगे।“ मेरी पत्नी को हमेशा से अपनी श्रवण शक्ति पर गर्व रहा है।  बात कितनी भी धीरे से कही जाये, वह सुन ही लेती हैं!  इस मामले में वह बिल्कुल मेरे बड़े बेटे पर गई हैं!  जब वह यू.के.जी. में पढ़ता था तो उसे घर के किसी भी दूर से दूर कमरे में पढ़ने के लिये बैठा दो पर उसे न सिर्फ टी.वी. बल्कि हम दोनों की बातचीत भी सुनाई देती रहती थी। बीच – बीच में आकर अपनी मां को टोक भी देता था, “नहीं मम्मी जी, ऐसी बात नहीं है। स्कूल में मैम ने आज थोड़ा ही मारा था, वो तो परसों की बात थी ! 
सिर्फ दो ही शायिकाओं का आरक्षण हुआ है, यह सुनते ही दोनों महिलाओं के हाथों के तोते उड़ गये।  मेरी पत्नी तो बेहोश होते होते बची ! तुरन्त दीवार का सहारा लिया, बीस नंबर की बर्थ पर बैठी, फिर आहिस्ता से लेट गई।  पानी का गिलास दिया तो एक – दो घूंट पीकर वापिस कर दिया और ऐसी कातर दृष्टि से मेरी ओर देखा कि मेरा भी दिल भर आया। पंकज की पत्नी ने भी तुरन्त 21 नंबर बर्थ पर कब्ज़ा जमाया और पंकज से बोली, “अब आप पूरी रात यूं ही खड़े रहो, यही आपकी सज़ा है। हम दोनों बेचारी शरीफ, इज्जतदार महिलाओं को धोखा देकर ले आये।  हमें पता होता कि टिकट कन्फर्म नहीं हुए हैं तो घर से बाहर कदम भी नहीं रखते!”
अचानक मेरी छटी इन्द्रिय को कुछ खतरे का एहसास हुआ । धड़कते दिल से मैने पंकज से पूछा, “और वापसी का ?  वह तो कन्फर्म है ना?”  पंकज बोला, “भैया, आप भी?”  और ठीक वैसा ही चेहरा बनाया जैसा सीज़र ने तलवार के वार से दम तोड़ने से पहले अपने सबसे विश्वसनीय मित्र ब्रूटस को धोखेबाजों के बीच में देख कर बनाया था – “Et tu, Brute?”  पर मेरी प्रश्नवाचक भावभंगिमा में कोई परिवर्तन न आता देख कर बोला, “वह तो कन्फर्म ही समझो!  आर.ए.सी. में हैं, नंबर 1,2,3 और 4 !  अगर वह कन्फर्म न हों तो आप मेरा नाम बदल देना !“  सच, एक क्षण के लिये तो मेरा मन किया कि यहीं खड़े – खड़े पंकज का एन्काउंटर करवा दूं !  मुझे समझ नहीं आ रहा था कि वापिस लौट कर आकर मेरी बीवी मेरे साथ क्या सलूक करेगी !   रही बात पंकज का नाम बदल देने की तो मैं पंकज का नाम बदल कर क्या कर लेता?  हाईस्कूल प्रमाणमत्र में जो भी नाम हो, वह जीवन भर के लिये स्थाई हो जाता है, ऐसे में अगर मैं कोई पंकज का नाम बदल कर रीठा सिंह जैसा गन्दा सा नाम रख भी दूं तो उसकी कोई वैलिडिटी तो होगी नहीं !”  
इस खतरनाक विषय को बदलने के प्रयास में पंकज ने फटाफट अपना काला बैग फिर खोला और थर्मस निकाला, थर्मोकोल के दो गिलास निकाले, चाय गिलास में डाली और मेरी पत्नी से बोला, “भाभी, चाय ! घर की चाय अब आठ दिन बाद ही मिलेगी, यह सोच कर ले आये थे।  वाह, क्या ब्रह्मास्त्र चलाया था पंकज ने, एक तीर से दो शिकार! चाय का ज़िक्र कानों तक पहुंचते ही दोनों महिलाएं एक झटके से उठ बैठीं और अपने अपने गिलास लपक लिये!  मेरी पत्नी ने पंकज से कहा, “वैसे भैया, आप बड़े धोखेबाज हो, फोन पर तो आपने कहा था, रिज़र्वेशन हो गया है। टिकट वेटिंग में मिले हैं, यह पता होता तो मैं घर से आती ही नहीं। प्रोग्राम कैंसिल कर दिया होता।“  
“बस इसी डर से तो नहीं बताया। आपको कब-कब छुट्टी मिलती हैं, कब-कब घूमने के प्रोग्राम बनते हैं। साल भर आप मेहनत करती हैं, चीनू तो आपको अपना आइडल मानती है।  ज़िन्दगी में पहली बार तो हमने आपके साथ जाने का प्रोग्राम बनाया, वह कैंसिल होने की सोच कर ही हमारा तो मन भर आता था। बस, सोचा कि हिम्मत करके चले चलते हैं, दो बर्थ तो मिल ही चुकी हैं, दो और भी मिल ही जायेंगी।  अगर नहीं मिली तो भी कौन सा पहाड़ टूट पड़ेगा। अगर भैया भाभी गुस्सा भी करेंगे तो हंसते-हंसते सह लेंगे पर विश्वास रखिये,  आप दोनों को हम कोई तकलीफ नहीं होने देंगे, भाभी !  जरूरत पड़ेगी तो हम दोनों बर्थ के बीच में फर्श पर ही बिस्तर फैला लेंगे।  आप बिल्कुल भी चिंता न करें।  पंकज के इन भावुकता पूर्ण उद्‌गारों को सुनकर चीनू ने भी पंकज के सुर में सुर मिलाया ।  मेरी पत्नी इतनी भावुकता कभी भी सहन नहीं कर पाती, तुरन्त दिल भर आया!  चाय की सुड़की लेते हुए बोली, “अरे, नहीं, मैं तो मज़ाक कर रही थी !  घर से घूमने निकले हैं तो कष्टों की क्या चिन्ता करनी?”  जो भी होगा, देखा जायेगा। वैसे, चाय बहुत अच्छी है।“                   
हमने अपने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई !  सामने वाली बर्थ पर एक महिला और एक पुरुष बैठे थे जिनके ’मास’ और ’वॉल्यूम’ को देखकर मैं भौंचक्का रह गया।  मैने सहयात्रियों से बात शुरु करने के लिहाज से उनसे पूछा, “आपकी बर्थ कौन – कौन सी हैं? मुझे सीधे जवाब न देकर उस सहयात्री महिला ने मेरी पत्नी की ओर उन्मुख होकर उत्तर दिया, “हमारे पास भी एक ही बर्थ है।  देवबन्द से बैठे हैं, जम्मू जा रहे हैं, वहां से कटरा, माता वैष्णो देवी के दरबार में ! टी.टी. की इंतज़ार कर रहे हैं, जो होगा देखा जायेगा। जैसी मातारानी की इच्छा होगी, हो जायेगा।  इतना कह कर उन्होंने आकाश की ओर देख कर हाथ जोड़ दिये। उनकी देखा देखी, हम सब ने भी आकाश की ओर देखा और हाथ जोड़ दिये।  आकाश की ओर देखने के प्रयास में ऊपर की बर्थ पर निगाह पड़ी तो एक नव-दंपत्ति अपर बर्थ पर बैठे हुए खुसर-पुसर के अंदाज़ में बातचीत में लीन दिखाई दिये।  युवती के हाथों में कलाई से लेकर कुहनी तक चूड़ियां ही चूड़ियां थीं !  इससे पहले कि मैं उनसे भी अपना वही प्रश्न दोहराऊं, युवक ने इशारे से दोनों अपर बर्थ की ओर इशारा कर दिया कि वे दोनों उनकी हैं। दूसरी बर्थ पर उन्होंने अपनी अटैची – बैग सजाये हुए थे।  मैने आहिस्ता से पत्नी से कहा कि तुम इन दोनों से पूछ लो, अगर ये एक बर्थ को खाली ही रखने वाले हों तो वह बर्थ हम इस्तेमाल कर लें !  पत्नी ने अपनी बड़ी-बड़ी आंखें तरेरीं और दोनों महिलाएं इस बात पर खी-खी कर हंस पड़ीं ।
मैने कोच से बाहर झांका तो देखा कि कोई परिचित सा स्टेशन है। जरा गौर से देखा तो दिल को धक्का लगा, अरे, यह तो सहारनपुर ही था।  इसका मतलब अभी तक गाड़ी सहारनपुर में ही खड़ी हुई है?  केवल दस मिनट का हाल्ट था, मगर आधा घंटे से अधिक हो चुका था और गाड़ी इंच भर भी आगे नहीं बढ़ी थी!  मुझे लगा कि हो न हो, गाड़ी लोड मान रही है।  शायद इंजन ने आगे बढ़ने से इंकार कर दिया हो!  और भला क्यों नहीं !  चालीस किलो प्रति व्यक्ति की अधिकतम सीमा को लांघ कर पंकज कम से कम चार सौ किलो वज़न का सामान लिये हुए था।  दो-दो सौ किलो के ये सामने वाले दंपत्ति भी होंगे! 
मुझे परेशान देख कर, दो सज्जन जो अपने घुटनों पर ब्रीफ केस रख कर ताश खेल रहे थे और शक्ल सूरत से दैनिक यात्री लग रहे थे, बोले, अभी गार्ड के घर से टिफिन नहीं आया होगा।  जब तक उसका खाना नहीं आयेगा, वह हरी बत्ती नहीं दिखायेगा।  मुझे लगा ये जरूर लक्स का अंडरवीयर बनियान पहनते होंगे जो अन्दर की बात बता पा रहे हैं। खैर, पांच मिनट बाद गाड़ी ने रेंगना शुरु कर दिया तो हमने भी अपनी चिन्तनधारा का मुख अन्दर की ओर मोड़ लिया। अपना सामान अपनी दोनों बर्थ के नीचे सैट करने का प्रयास किया पर भला बर्थ के नीचे कितने अटैची – बैग समा सकते थे?  बाकी बाहर ही रखे रहे।  दोनों महिलाओं ने अपने – अपने खाने वाले बैग खोले। दोनों ही इतना सारा खाना बना कर लाई थीं कि हम अपने पड़ोसियों को भी निमंत्रित कर सकते थे।  पर किसी अनजान सहयात्री को भोजन के लिये पूछना, वह भी यात्रा का शुभारंभ होते ही, उसे धर्मसंकट में डाल देने जैसा गुनाह है।  भारतीय रेल में हर स्टेशन पर लिखा होता है, “कृपया अनजान व्यक्ति के कोई भी खाद्य पदार्थ ग्रहण न करें, शायद उसमें विष मिला हो।“  अगर आप किसी को खाने के लिये पूछते हैं तो वह भी आपसे खाने के लिये पूछता है।  ऐसे में जब तक अपरिचय की दीवार न ढह जाये, समस्त शंकायें लघु हो जायें और उसके बाद तिरोहित हो जायें तब तक किसी से भी औपचारिकतावश भोजन के लिये पूछना गलत ही प्रतीत होता है। हां, मूंगफली की बात अलग है।  कोई मूंगफली का वह लिफाफा आपके आगे करे जिसमें से वह खुद भी खा रहा हो तो एक मूंगफली तो अवश्य ही खा लेनी चाहिये।
आमने सामने की दोनों बर्थ पर हमने अपना आसन जमाया और एक दूसरे के कटोरदान में से खूब प्रेमभाव से खाना खाया।  दो सब्ज़ियां और पूरी हमारे पास, पनीर के पराठे, दो सब्ज़ियां और दही का टैट्रापैक उनके पास। जम कर दावत उड़ाई गई।  हमें खाना खाते देख कर हमारे सहयात्रियों को भी भूख लग आई।  उन्होंने भी अपना चार डब्बे वाला शाही आकार का टिफिन बैग में से बाहर  निकाला, साथ में एक बड़ा कटोरदान भी।  उन दोनों के आकार प्रकार को देखते हुए इससे छोटा टिफिन तो बेहूदा ही लगता।  बचपन में हम ओम प्रकाश शर्मा के जासूसी उपन्यास पढ़ा करते थे जिसमें एक डायलॉग होता था – “जितना बड़ा जूता होगा, उतनी ज्यादा पालिश लगेगी!”  तो बस, संदर्भ भले ही अलग हो, पर निहितार्थ तो वही था। 
अम्बाला में टी.टी.ई. का आगमन हुआ तो पंकज उस से बिल्कुल ऐसे चिपक गया जैसे फेविक्विक लगा रखी हो !  टी.टी.ई. पहले तो भाव खाता रहा, इधर उधर घूमता रहा पर अपना पंकज भाई भी कम थोड़ा ही था, “तू जहां – जहां चलेगा, मेरा साया साथ होगा” वाले अंदाज़ में उसके आगे अपना पर्स हिलाता घूमता रहा और एक बर्थ आबंटित कराये बिना वहां से हिल कर नहीं दिया।  अब दो लोअर बर्थ के अतिरिक्त एक मिडिल बर्थ भी हमारी हो गई थी। पंकज और मैं दोनों इस मिडिल बर्थ पर एक दूसरे की विपरीत दिशा में पैर करके लेट गये।  मेरा एक बैग जिसमें मेरा कैमरा और लैपटॉप थे, मेरे से एक पल के लिये भी जुदा नहीं हो सकता था सो वह बैग भी मेरे सिरहाने में था।  हालत ऐसी थी कि हम दोनों के लिये ही करवट बदलना भी असंभव था।  मुझे बार-बार यही लगता रहा कि अपने ऊपर वाले युगल को प्रेरित करूं कि वह दोनों प्रेम भाव से एक ही बर्थ पर एडजस्ट हो जायें और एक बर्थ हमें दे दें। बिना मेरी प्रेरणा के भी वह शायद ऐसा ही करने वाले थे, पर अपने बेशकीमती सुझाव को मैने अपने तक ही रखा।  आज कल किसी को अच्छी राय भी कब बुरी लग जाये, क्या पता। 
हमारे दो सौ किलो वाले सहयात्रियों को टी.टी.ई. ने मांगने पर भी एक और बर्थ नहीं दी थी और उन दोनों का वृहत्त आकार इस बात की अनुमति नहीं देता था कि वह दोनों पूरी रात एक बर्थ पर किसी भी ढंग से विश्राम कर सकें।  मैं तो यही सोच सोच कर परेशान था कि इनका दर्ज़ी इनकी कमर का नाप कैसे लेता होगा?  एक टेप से तो काम नहीं चल सकता था और अगर दो टेप आपस में बांध दिये जायें और फिर नाप लेने की कोशिश की जाये तो दर्ज़ी के हाथ भी तो उतने लंबे होने चाहियें जो कमर का पूरा घेरा पार कर के पीछे एक दूसरे को छू लें।  बस, नाप लेने की केवल एक संभावना हो सकती थी और वह ये कि दर्ज़ी अपने चेले से कहे कि तू इधर से टेप का एक सिरा पकड़ और मैं दूसरी तरफ से चक्कर लगा कर अभी आता हूं ।  खैर जी, हमें क्या?
हमारी दोनों लोअर बर्थ पर दोनों महिलाओं को सोते देख कर सामने वाली वृहत्ताकार महिला ने दोनों बर्थ के बीच में फर्श पर ही बिस्तर डाल लिया और सो गई।  मुझे भी अब राहत थी, अगर पंकज या मैं सोते – सोते मिडिल बर्थ से नीचे गिरते भी तो चोट लगने का खतरा अब पूरी तरह से समाप्त हो चुका था।
पूरी रात इसी प्रकार सोते-जागते बीती और सुबह पांच बजे जम्मू पहुंचे।  बाहर आये तो टैक्सी ड्राइवर को फोन करके पूछा कि टैक्सी कहां खड़ी है।  नई – नवेली फोर्ड टैक्सी देखी तो रात की कष्टकर यात्रा का ग़म कुछ कम हुआ। मेरा कैमरे का बैग और पंकज के बच्चे का बैग छोड़ कर बाकी सारा सामान टैक्सी ड्राइवर ने बड़े कलात्मक ढंग से कार की डिक्की में किस तरह से समा दिया, यह वास्तव में सीखने लायक था।  रेलयात्रा कैसी भी रही हो, पर अब हमें 2200 रुपये रोज़ की दर पर एक नयी नवेली वातानुकूलित टैक्सी और एक बहुत ज्यादा बोलने वाला ड्राइवर मिल गया था जिसने मेरी पत्नी के पूछने पर “भैया, आपका नाम क्या है?” अपना नाम प्रीतम प्यारे बताया तो मुझे धर्मेन्द्र और अमिताभ बच्चन की “चुपके – चुपके” फिल्म की याद आगई जिसमें धर्मेन्द्र अपनी साली के घर में टैक्सी ड्राइवर की नौकरी पाने के लिये पहुंचता है और पूछने पर अपना नाम “प्रीतम प्यारे” बताता है और साथ में अपनी साली से यह भी कहता है, “आप चाहे तो प्रीतम कह लें या प्यारे कह लें – कुछ भी चलेगा। मुझे भी शक हुआ कि ये इसका वास्तविक नाम है या चुपके-चुपके फिल्म से प्रेरित होकर इसने अपना नाम प्रीतम प्यारे रख लिया है। खैर !

शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

सेकुलरिस्ट पार्टियों को अयोध्या फैसला अपने लिये हानिकर प्रतीत हो रहा है।

अब जबकि अयोध्या फैसले को लेकर देश के हर कोने से सन्तोष, प्रसन्नता और सद्भाव की भावनायें व्यक्त की जा रही हैं,  मुम्बई के मुसलमान राम मन्दिर निर्माण के लिये ईंटें देने का प्रस्ताव रख रहे हैं, हर ओर न्यायपालिका की वाह-वाही हो रही है,  कुछ घटिया राजनीतिबाज एक दिन फैसले से सुन्न रह जाने के बाद अब पुनः देश को आग में झोंकने का प्रयास करते दीख रहे हैं। उन्हें यह अफसोस है कि देश के मुस्लिम समुदाय ने इस फैसले को शान्ति व सन्तोष के साथ स्वीकार क्यों कर लिया है, प्रसन्नता क्यों व्यक्त की है।

इन घटिया राजनीतिबाजों की लिस्ट में सबसे पहला नाम मुलायम सिंह यादव का आता है। ये महाशय फरमा रहे हैं कि "न्यायपालिका के इस फैसले से देश के मुसलमान स्वयं को ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं।"  वास्तव में वह चाहते हैं कि देश के मुस्लिमों को इस फैसले को अस्वीकार कर देना चाहिये ।  यह वही मुलायम सिंह हैं जिन्होने आडवाणी की राम रथ यात्रा के दौरान, रथयात्रा के जवाब में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में तथाकथित ’सद्‌भावना यात्रायें’ आयोजित की थीं और जिस-जिस जिले में भी गये थे,  वहीं दो दिनों के अन्दर अन्दर साम्प्रदायिक दंगे भड़कते चले गये थे।  देश के तथाकथित सेकुलरिस्टों ने इन सभी दंगों के लिये राम रथयात्रा को दोषी ठहराया था जबकि इन दंगों के सूत्रधार मुलायम सिंह यादव खुद थे।  राम रथयात्रा तो उत्तर प्रदेश तक पहुंच ही नहीं पाई थी और जहां - जहां से राम रथयात्रा निकली थी, वहां साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए थे।  दंगे हुए भी थे तो उत्तर प्रदेश के उन जिलों में जहां मुलायम सिंह यादव ने अपने वक्तव्यों से रामजन्म भूमि आन्दोलन के विरुद्ध जहर उगला था।

सूची में अगला नाम आता है पी. चिदम्बरम का ।  हिन्दू और मुस्लिम नेतृत्व कह रहा है कि पुरानी कटुता को भुला कर हमें उज्ज्वल भविष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिये और विभिन्न समुदायों के बीच परस्पर सहयोग के एक नये युग की शुरुआत होनी चाहिये ।  राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत भी अत्यन्त मृदु भाषा में हिन्दू - मुस्लिम सद्‍भाव को और पुष्ट करने की जरूरत पर बल दे रहे हैं परन्तु पी. चिदम्बरम देश के मुसलमानों को बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने की याद दिला-दिला कर प्रयास कर रहे हैं कि मुस्लिम और हिन्दू समुदाय के बीच में जो समझदारी पूर्ण समरसता का मार्ग खुल रहा है, वह फिर से बन्द हो जाये ।  वास्तव में पी चिदम्बरम एक राष्ट्रीय शर्म हैं।  जब वह कहते हैं कि यह सब झूठ है कि भारत कभी सोने की चिड़िया था, यहां घी - दूध की नदियां बहती थीं,  ज्ञान - विज्ञान का बोलबाला था,  भारत विश्वगुरु कहलाता था तो वह यही सिद्ध करते हैं कि मैकाले ने भारतीयों के लिये जिस प्रकार की शिक्षा का प्रबन्ध किया था, वह उस शिक्षा का सबसे घटिया उत्पाद और राष्ट्रीय शर्म बन कर देश के सम्मुख उपस्थित हैं और हर दृष्टि से एक काले अंग्रेज़ हैं।   ऊपर से करेला और नीम चढ़ा ये कि वे कांग्रेसी भी हैं और यह यह सोच-सोच कर परेशान हैं कि कहीं इस अयोध्या फैसले का लाभ भाजपा न ले जाये ।  इसलिये वह मुस्लिम समुदाय को भड़का रहे हैं कि कहीं संघ और भाजपा के साथ प्रेम की पींगें न बढ़ाने लग जाना क्योंकि ये वही लोग हैं जिन्होंने तुम्हारी बाबरी मस्जिद को ढहाया था। वास्तव में कांग्रेसियों ने अंग्रेज़ों से सबसे पहला सबक जो सीखा था वह यही है - "फूट डालो और राज करो।"   यदि भाजपा और संघ मिल कर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच में विश्वास का माहौल बनाना भी चाहें तो कांग्रेस को अपनी गद्दी डगमगा रही लगने लगती है। वह यह कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती कि हिन्दू और मुस्लिमों के बीच में सद्‌भाव बने क्योंकि यदि ऐसा होगा तो संघ और भाजपा को खलनायक के रूप में कैसे चित्रित करेंगे?  

जब तक देश में इस प्रकार की घटिया वोटपरक राजनीति चलती रहेगी, हिन्दू और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई भी खोदी जाती रहेगी ।  होना यह चाहिये था कि अदालत के इस फैसले के बाद अयोध्या में रामजन्मभूमि स्थल पर एक भव्य मंदिर और फैज़ाबाद में एक शानदार मस्जिद बनाने का एजेंडा सामने रख कर आगे बढ़ा जाता,  पर देश के सेकुलरिस्टों को यह चिन्ता खाये जा रही है कि यदि हिन्दू और मुस्लिम एक हो गये तो उनकी सेकुलर वाद की राजनीति की दुकान बन्द हो जायेगी ।   क्या हमारे नेता वास्तव में लोकतंत्र का अर्थ समझ पाये हैं?    

रविवार, 20 दिसंबर 2009

इन विचारणीय बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैं?

प्रिय मित्रों,

 

शिक्षा के क्षेत्र में हमारे देश में अनेकानेक विरोधाभास दृष्टिगोचर होते हैं। कुछ संस्थान ऐसे हैं जो शिक्षा के उच्च स्तर के लिये प्रसिद्ध हैंवहां प्रवेश पाना किसी भी विद्यार्थी का स्वप्न हो सकता है।  वहीं दूसरी ओरदेश के हज़ारों नगरों, कस्बों में ऐसे विद्यालय, महाविद्यालय हैं जहां पढ़ाई आम तौर पर होती ही नहीं।  छात्र - छात्रायें अगर इन विद्यालयों में जाते भी हैं तो सोशल नेटवर्किंग के लिये, नेतागिरी सीखने के लिये या येन-केन-प्रकारेण एक अदद डिग्री हासिल करने के लिये।  अध्यापक - अध्यापिकायें इन कॉलेजों में आते हैं तो उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर करने और वेतन लेने के लिये, धूप सेंकने के लियेट्यूशन के लिये आसामी ढूंढने के लिये या फिर साथियों के साथ गप-शप करने के लिये। 

 

प्राइमरी या माध्यमिक स्तर की शिक्षा का जहां तक संबंध हैदिखाई ये दे रहा है कि प्राइवेट स्कूलों में (जिनको अंग्रेजी माध्यम या पब्लिक स्कूल भी कहा जाता है)  शिक्षा का माहौल सरकारी स्कूलों या हिन्दी मीडियम के स्कूलों की तुलना में बहुत बेहतर है। अंग्रेज़ी माध्यम के सारे स्कूलों का स्तर अच्छा हो, ऐसा नहीं है। (हर शहर, कस्बे में असंख्य स्कूल ऐसे भी हैं जो ढेर सारा धन कमाने के इच्छुक शिक्षित अथवा अर्द्धशिक्षित लोगों ने अपने घर के कुछ हिस्से में ही खोल लिये हैं और एक बोर्ड टांग कर, अपने घर की नौकरानी को आया और पत्नी को प्रधानाचार्या बना कर और खुद प्रबंधक बन कर विद्यालय आरंभ कर दिया गया है।  मुहल्ले पड़ोस की लड़कियों को छः सौ - आठ सौ रुपये प्रतिमास देकर अध्यापिका बना लिया गया है।  परन्तु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि इन स्कूलों के अध्यापकों, अध्यापिकाओं को पढ़ाना आता हो या न आता हो; अपेक्षित सुविधायें हों अथवा न होंस्कूल का प्रबंधन वर्ग पढ़ाई के माहौल को लेकर, अनुशासन को लेकर, और अपने विद्यालय की छवि निर्माण को लेकर सजग अवश्य है।)      

 

डिग्री कॉलेजों का जहां तक संबंध है, अंधेर नगरी, चौपट राजा वाली कहावत यहां चरितार्थ होती दिखाई देती है। छात्रों से पूछो तो वह अध्यापकों को दोष देते हैं; अध्यापकों से पूछो तो छात्रों को, प्रिंसिपल को, विश्वविद्यालय को या शिक्षा व्यवस्था को दोष देते हैं।  प्रिंसिपल से पूछो तो वह स्थानीय नेताओं को और उनके संरक्षण में पलने वाले गुंडेछाप छात्रों को कॉलेज का वातावरण प्रदूषित करने के लिये दोषी ठहराते हैं, हर दूसरे-तीसरे दिन छुट्टी करने के लिये सरकार को, विश्वविद्यालय को, अध्यापकों को दोषी ठहराते हैं।  प्रबंधन वर्ग से पूछो तो वह शिक्षण तंत्र में, सरकार में, विश्वविद्यालय की नीतियों में दोष ढूंढते हैं।

 

इस सब के बारे में विचार करें तो निम्न प्रश्न उभरते हैं :

 

१-   क्या हमारे अध्यापक अध्यापन को लेकर गंभीर हैंया, वह सिर्फ ट्यूशन को लेकर ही गंभीर हैं?   क्या ऐसे भी अध्यापक विद्यालयों में, महाविद्यालयों में नौकरी पा गये हैं जो अध्यापन कार्य के लिये पूर्णतः अनुपयुक्त हैं यदि हां, तो इस समस्या का क्या हल है?

 

२-  क्या छात्र-छात्रायें अध्ययन को लेकर गंभीर हैंयदि नहीं तो फिर वह कॉलेजों में प्रवेश लेते ही क्यों हैंजो छात्र-छात्रायें पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं पर उनको अपेक्षित माहौल नहीं मिल पा रहाक्या उनके पास इस समस्या का कोई समाधान हो सकता है?

 

३-  क्या इस मामले में हमारे शिक्षा तंत्र में, शिक्षण पाठ्यक्रम में भी कुछ दोष हैं?

 

इन विचारणीय बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैंआपके विचार हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं।  अतः कृपया हमें अवश्य ही लिखें।   

  

संपादक

द सहारनपुर डॉट कॉम

 

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शनिवार, 5 दिसंबर 2009

"सिर्फ अम्मा ही क्यों ? पिताजी क्यों नहीं?"

मित्रों,

 

"सिर्फ अम्मा ही क्यों ? पिताजी क्यों नहीं?" हमारे अनेक पाठकों ने हमारे सम्मुख प्रश्न किया है कि आप www.the-saharanpur.com/amma.html  पर केवल "अम्मा" को ही समर्पित रचनायें छाप कर क्यों रुक गये हैंक्या हमारे जीवन में पिता का स्थान अम्मा से कमतर होता हैअब आप ही बताइये, हम अपनी दो आंखों में किसे से ज्यादा महत्वपूर्ण मान सकते हैं भला?   पर हमारे सुधि पाठकों की यह प्यार भरी शिकायत जायज़ है और इसीलिये आज हम एक अद्‌भुत काव्य रचना से अपने पूर्वजों को प्रणाम करने का यह क्रम पुनः शुरु कर रहे हैं।  उम्मीद है कि आप लोग अपने पूज्य पिता श्री के प्रति अपने भाव-पुष्प समर्पित करने में पीछे नहीं रहेंगे।  तो मित्रों, ये रही इस अभियान की प्रथम रचना !

 

मेरे बाबूजी !

 

सौ सुमनों का एक हार हैं मेरे बाबूजी,

बाहर भीतर सिर्फ प्यार हैं मेरे बाबूजी !

 

सारे घर को जिसने अपने स्वर से बांध रखा,

उस वीणा का मुख्य तार हैं मेरे बाबूजी !

 

पूरी रचना पढ़ने के लिये क्लिक करें >>>>

 

यदि आपने अम्मा को समर्पित कवितायें जो हमें प्राप्त हुईं, अभी तक न पढ़ी हों तो आप यहां पढ़ सकते हैं।  चाहें तो अपनी कविता भी भेज सकते हैं।

 

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मंगलवार, 17 नवंबर 2009

"जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं" - विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना एवं विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या - प्रतिष्ठा शर्मा

"जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं"  विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या एवं विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना प्रतिष्ठा शर्मा के मनोरंजक संस्मरण जो वह खाड़ी देशों की यात्रा से लौट कर आपके साथ बांट रही हैं।  www.thesaharanpur.com/gulf.html

 

"सहारनपुर की धरती पर पांच सौ कलाकार अपने कैनवस और तूलिका के साथ अपनी कल्पनाओं को रंग भरने में जुटे।"  - सृजन २००९ फोटो गैलरी में मिलिये इन बाल एवं युवा कलाकारों से।  www.thesaharanpur.com/drawingcomp.html

 

 

गुरुवार, 12 नवंबर 2009

जिसे वन्दे मातरम्‌ गाना होगा, अवश्य गायेगा - फतवा हो या न हो !

इस्लामिक नेताओं द्वारा वन्दे मातरम्‌ के विरोध के विरोध में अनेकों स्तर पर क्षोभ व रोष का प्रदर्शन हुआ है।  दारुल उलूम देवबन्द द्वारा वन्देमातरम्‌ गायन हेतु मुसलमानों को अनुमति दे दिये जाने के समाचार से देश वासियों ने राहत की सांस ली ही थी कि अगले ही दिन दारुल उलूम के वन्दे मातरम्‌ विरोधी बयान फिर आ जाने से यह स्पष्ट हो गया कि कट्टरपंथी ताकतें सिर्फ पाकिस्तान सरकार पर ही हावी नहीं हैं, बल्कि दारुल उलूम देवबन्द भी इनका शिकार है।

इतिहास गवाह है कि इस्लामिक भावनाओं का सम्मान करते हुए वन्दे मातरम्‌ को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करते समय उसमें केवल वे ही दो पद आधिकारिक रूप से स्वीकार किये गये थे जिनमें किसी भी प्रकार से मुस्लिम विरोध की भावना की कोई गुंजाइश नहीं थी।  पर अगर विरोध करने के लिये विरोध करना ही लक्ष्य हो तो एक कारण न रहे तो न सहीदूसरा कारण ढूंढ लिया जायेगा। यही वन्दे मातरम्‌ के साथ हो रहा है।  वन्दे मातरम्‌ का विरोध करने वाले कतिपय मुस्लिम मजहबी नेता व राजनीतिज्ञ सिर्फ अखबारों व टी.वी. चैनल पर अपने नाम और चेहरे देखने के लालच में ऐसे अतिवादी बयान और फतवे दिया करते हैं और यह आभास देते हैं कि उनके फतवों का उनके अनुयायी आदर-सम्मान करते हैं।  जब कि सच यह है कि इस्लामिक मजहबी नेताओं को राजनीतिज्ञ लोग तो सिर्फ इस लिये लिफ्ट देते हैं कि शायद उनके समर्थन और सहयोग से कुछ मुस्लिम वोट पक्के हो जायेंगे।  मीडिया इस लिये उनकी बातों को लेकर सुर्खियां बनाता है कि इससे सनसनी पैदा होगी और अखबार बिकेगा, टी.आर.पी. रेटिंग ऊंची जायेगी ।  पर जहां तक आम मुसलमान का सवाल हैअब उसकी मानसिकता बदल गई है।  वह देख रहा है कि समर्थ को कोई दोष नहीं लगता ।  सानिया मिर्ज़ा द्वारा टेनिस खेलते हुए जो मिनी स्कर्ट पहनी जाती है उसका विरोध किया गया पर जब सानिया ने एक नहीं सुनी तो चुप होकर बैठ गये।  ए. आर. रहमान ने वन्दे मातरम्‌ गीत का न केवल शानदार संगीत तैयार किया, अपितु इस अत्यन्त लोकप्रिय गीत को अपनी मधुर आवाज़ भी दी।  ए.आर. रहमान का इन फतवा - विशेषज्ञों ने क्या बिगाड़ लिया ए.आर. रहमान से पहले भी मुहम्मद रफी जैसे महान गायक हुए जिनके गाये भजन आज तक कानों में गूंजते रहते हैं।  न जाने कितने मुस्लिम अभिनेता - अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने हिन्दू किरदार निभाते हुए हर वह रस्म निभाई जो शरियत में मना होगी। सिंदूर भी लगायाबिछुए, कंगन, मंगलसूत्र भी पहने और मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना भी की।  किसने उनका क्या बिगाड़ लिया ?  

 

सच तो यह है कि अपने अनुयायियों को भेड़- बकरियों की तरह हांकने की इन फतवेदारों की मनोवृत्ति को उनके खुद के अनुयायी पहचान रहे हैं।  गणित और विज्ञान की शिक्षा का विरोध करके इन मजहबी नेताओं ने स्वयं ही बता दिया है कि वह किस अंधे कुएं में बैठे हैं और बाहर निकलने को राजी नहीं हैं। इन मजहबी और राजनीतिक नेताओं के पीछे चलते चलते मुसलमान प्रगति की दौड़ में पिछड़ता चला गया है क्योंकि इन नेताओं की दिलचस्पी वास्तव में केवल अपनी दुकान चलाने में है।  और यह दुकान तब तक ही चलती है जब तक ऐसा आभास बना रहे कि आम मुसलमान उनकी बात सुनता और मानता है।  

 

प्राचीन भारत में ऋषि मुनि कभी कभी नाराज़ होकर श्राप दे दिया करते थे। नाराज़ होने वालों में दुर्वासा ऋषि का नाम सबसे प्रमुख है।  यह श्राप भी एक प्रकार का फतवा ही था जो ऋषि-मुनियों की नैतिक सत्ता के कारण प्रभावी होता था।  राजा-महाराजा इस श्राप को लागू करने में उनकी मदद किया करते थे।  गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या का परित्याग किया तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि गौतम ऋषि के आदेश का विरोध कर सके।  पर दशरथ पुत्र राम ने गौतम ऋषि के श्राप की रत्ती भर परवाह न करते हुए मां अहिल्या के न केवल दर्शन किये बल्कि उनके पुनर्वास का भी दायित्व उठाया।  यह एक नैतिक सत्ता को दूसरी नैतिक सत्ता द्वारा चुनौती देने का अन्यतम उदाहरण है। 

 

आधुनिक युग में भी देखें तो न्यायालय के फैसले तब तक ही सम्मान्य होते हैं जब तक वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के अनुकूल होंदेश व समाज के हित साधक हों।  माननीय उच्चतम न्यायालय के अनेकानेक फैसले ऐसे हैं जिनको कांग्रेस सरकार ने कभी भी अहमियत नहीं दी, उनको लागू कराने की कभी कोई चेष्टा नहीं की गई क्योंकि विधायिका का दृष्टिकोण न्यायपालिका के दृष्टिकोण से जुदा था।  कई बार इन फैसलों को नकारने के लिये कानून में ही परिवर्तन कर दिया गया और कई बार सिर्फ अनसुना कर दिया गया।  ऐसे में न्याय पालिका ने भी अपने फैसलों के सम्मान की रक्षार्थ "सुझाव" शब्द का उपयोग करना आरंभ कर दिया। 

 

वास्तविकता के धरातल पर तो ऐसा पहले ही हो चुका है कि फतवे एक सुझाव से अधिक महत्व के नहीं रह गये हैं।  फतवों का कितना महत्व होगा, यह सीधे-सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि वह फतवा एक आम समझदार नागरिक की बुद्धि में फिट बैठता है या नहीं।  यदि कोई मजहबी नेता मुसलमानों को यह आज्ञा दे कि गणित और विज्ञान पढ़ाना बन्द करो, डायनिंग टेबिल पर बैठ कर खाना मत खाओ, टीवी मत देखो, मोबाइल मत प्रयोग करो तो भला ऐसे फतवों का क्या हश्र होगा ?   यदि एक आम मुसलमान को लगता है कि ए.आर. रहमान ने वन्दे मातरम्‌ गाया और जन-जन का खूब प्यार और सम्मान अर्जित किया तो एक आम मुसलमान भी वन्दे मातरम्‌ गाने से क्यों परहेज़ करने लगा जिसका मन चाहेगा, वन्दे मातरम्‌ गायेगा, खूब गायेगा, डंके की चोट पर गायेगा - वन्दे मातरम्‌ गाने वाले किसी भी मुसलमान का कम से कम भारत में तो ये फतवा विशेषज्ञ कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे।

 


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सोमवार, 2 नवंबर 2009

लेती नहीं दवाई अम्मा, जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

हमारे सहारनपुर के गौरव, हम सब के दुलारे कवि और मेरे प्रिय सखा श्री योगेश छिब्बर ने अपनी नवीनतम रचना मुझे एस.एम.एस. द्वारा भेजी है -

लेती नहीं दवाई अम्मा,
जोड़े पाई-पाई अम्मा ।

(पूरी ग़ज़ल यहां उपलब्ध है)http://www.thesaharanpur.com/amma.html प्रो. छिब्बर का और अधिक परिचय - http://www.thesaharanpur.com/chhibber.html लिंक पर उपलब्ध है।

प्रो. छिब्बर ने आह्वान किया कि मैं भी अपनी अम्मा के प्रति अपनी भावनाओं को अभिव्यक्ति देते हुए कुछ पंक्तियां लिखूं और इस ग़ज़ल को आगे बढ़ाऊं । गीत, कवितायें और ग़ज़ल लिखना अपने बूते की बात नहीं पर घोर आश्चर्य ! जब अपनी अम्मा की छवि सामने रख कर गुनगुनाना शुरु किया तो कुछ पंक्तियां कागज़ पर उतर आईं।

आप भी तो अपनी अम्मा के बारे में कुछ कोमल भावनायें अपने हृदय में रखते होंगे / रखती होंगी ? अपनी अम्मा की छवि दस मिनट अपनी आंखों में बसा कर फिर इस गज़ल को गुनगुनाते हुए इसे और आगे बढ़ायें। यह हम सब बच्चों की ओर से हमारी प्यारी अम्मा को समर्पण होगा । ध्यान रखें, यह कोई गीत-गज़ल प्रतियोगिता नहीं हो रही है, जो भी लिखें, जैसा भी लिख पायें, २, ४ या ६ जितनी भी पंक्ति लिखें, अवश्य ही लिखें और हमें प्रेषित कर दें। आपकी पंक्तियां आपके नाम से उक्त पृष्ठ पर जुड़ती चली जायेंगी । प्यार और श्रद्धा से परिपूरित

सादर, सस्नेह,

आपका ही,

सुशान्त सिंहल
संस्थापक एवं संपादक
www.thesaharanpur.com
www.sushantsinghal.blogspot.com
email : info@thesaharanpur.com

मंगलवार, 8 सितंबर 2009

हिन्दी में एक नई वेबसाइट का आगमन

मित्रों,
बहुत समय से ब्लॉग की तरफ ध्यान नहीं दे पा रहा हूं। आपके ब्लॉग पढ़ता हूं पर लिखने का समय नहीं निकाल पा रहा। आप सोच रहे होंगे कि ऐसी भी मुई क्या व्यस्तता हो गई ! सच तो ये है कि मेरे शहर सहारनपुर सी एक ऐसी वेबसाइट बनाने का विचार मार्च २००९ में मन में आया जिसमें वह सब कुछ हो जो सहारनपुर के बारे में दुनिया जानना चाह सकती है और जो सहारनपुर वासी अपने बारे में दुनिया को बताना चाहेंगे। साइट हिन्दी व अंग्रेज़ी में द्विभाषी बनाने की इच्छा थी। प्रोजेक्ट की विशालता को देखते हुए और अपने सीमित संसाधनों को देखते हुए ब्लॉग में समय लगाने के बजाय मैने इस वेबसाइट पर ध्यान केन्द्रित किया। मुझे लगा कि सहारनपुर से उच्च-शिक्षा के लिये, जॉब के लिये या विवाह आदि अन्य कारणों से हर साल हज़ारों युवक-युवतियां बाहर चले जाते हैं। सहारनपुर के बारे में जानते रहने की, सहारनपुर से जुड़े रहने की उनकी इच्छा कभी उनको ओर्कुट पर ले जाती है तो कभी फेस बुक पर । सहारनपुर के लिये वे कुछ करना भी चाहते हैं पर दिशा नहीं मिलती। ऐसे सभी युवाओं के लिये भी, जो देश के विभिन्न हिस्सों में (खासकर बंगलुरु, नॉएडा, गुड़गांव, दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद) या अमेरिका, इंग्लैंड आदि देशों में रह रहे हैं - यह वेबसाइट एक ऐसा मंच बन जाये जिसमें उनको यहां के समाचार कम से कम साप्ताहिक रूप से तो मिलते ही रहें। बस, यही सब सोच कर एक वेबसाइट बना डाली है http://www.thesaharanpur.com/ कभी अवसर मिले तो देखिये और सुझाव भी दीजिये कि इसमें और क्या - क्या दिया जा सकता है, इसे खूबसूरत व आकर्षक बनाने के लिये क्या - क्या किया जाना चाहिये - आदि।
आपका ही अभिन्न,
सुशान्त सिंहल

गुरुवार, 19 मार्च 2009

आवश्यकता है ५४२ नालायकों की - कठोर टिप्पणी हेतु साधुवाद

मेरी पोस्ट "आवश्यकता है ५४२ नालायकों की" पर किन्हीं  BS की टिप्पणी के लिये उनका हार्दिक धन्यवाद।   इस प्रकार की पोस्ट पर एक रूढ़ि के रूप में, वाहवाही कर देने से बात वहीं की वहीं समाप्त हो जाती है जबकि विषय की गंभीरता मांग करती है कि इन प्रश्नों को मथा जाये।  आपने बहस चलानी चाहीइसके लिये आपको साधुवाद

बी एस ने जिन बिन्दुओं को अपनी टिप्पणी में स्पर्श किया है, उनसे मेरी असहमति नहीं है।  मैं राज्य सभा का जिक्र नहीं कर रहा हूं।  राज्य सभा और लोक सभा की चयन प्रक्रिया बिल्कुल अलग है।  मेरा प्रयास सिर्फ हमारे संविधान की उन खामियों की ओर इंगित करना है जिनके चलते हमारे सांसदों की हर अगली पीढ़ी पहले वाली पीढ़ी की तुलना में निकृष्ट होती चली गयी है।  

क्या ये सच नहीं है कि -

 -    हमारे संविधान में सांसद या विधायक पद हेतु चुनाव लड़ने के लिये जो अर्हतायें निर्धारित की गयी हैं उनसे कहीं अधिक अर्हतायें किसी विद्यालय में चपरासी बनने के लिये निर्धारित होती हैं?   हमारे देश के संविधान के प्रावधानों के अनुसार जो व्यक्ति स्कूल में चपरासी बनने के अयोग्य है, वह शिक्षा मंत्री बन सकता है और शिक्षा मंत्री बन कर उसी विद्यालय के वार्षिकोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में भाषण देने लगता है, विद्यालय के प्रधानाचार्य उसको माल्यार्पण करके स्वयं को धन्य हो गया मानने लगते हैं।  जो व्यक्ति सिपाही बनने के लिये भी अयोग्य है, उसे हमारा संविधान परेड की सलामी लेने योग्य बना देता है, उसे प्रतिरक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभालने के योग्य मान लिया गया है।  क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं? 

-   लालू प्रसाद यादव को बिहार का मुख्य मंत्री पद छोड़ कर जेल जाना पड़ा तो अपना राज-पाट अपनी लगभग निरक्षर पत्नी को सौंप गये।  मुख्य मंत्री के पद पर देश ने एक ऐसी महिला को विराजमान देखा जो चूल्हे-चौके के अलावा कुछ जानती ही नहीं थी। क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं? 

-   अपने लिये कानून स्वयं बना लेनाजब उच्चतम न्यायालय आपकी किसी हरकत को असंवैधानिक ठहराये तो उससे बच निकलने के लिये देश के कानून में ही परिवर्तन कर देना  हमारे देश में बड़ी आसानी से देखने को मिलता रहता है। क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं? 

     अपना वेतन और भत्ते खुद तय करना; जब चाहो, जितनी चाहो, उनमें वृद्धि कर लेना हमारे लोकतंत्र में अनुमन्य है । क्या ये किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हो सकते हैं? 

     आप पढ़े लिखे हैं, विद्वान हैंविभिन्न राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों का मनन करके, सभी प्रत्याशियों की कुंडली जांच कर वोट दे कर आते हैं, वहीं दूसरि ओर, आपके पड़ोस का कोई व्यक्ति देसी ठर्रे के एक पाउच के लालच में, या जात-बिरादरी के कहने पर एक गलत व्यक्ति को वोट दे आता है और इस प्रकार आपके वोट की महत्ता को समाप्त कर देता है - क्या ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत आप श्रेष्ठ जन-प्रतिनिधियों की उम्मीद कर सकते हैंक्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं         

     एक पांचवी पास दुकानदार, जो कल तक अपने मुहल्ले की दुकान पर कपड़ा बेच रहा था, आज हमारे लोकतंत्र की लायकी की वज़ह से विधायक और फिर मंत्री बन जाता है और एक आइ..एस. उसका सचिव बन कर उसके मातहत कार्य करने लगता है।  अब आप कल्पना कीजिये - इन तथाकथित 'माननीय' मंत्री महोदय को किसी भी शासकीय कार्य का कोई तज़ुर्बा नहीं है, कोई ट्रेनिंग की भी आवश्यकता नहीं समझी गयी है।  मंत्री पद इस लिये मिल गया क्योंकि उनकी जाति को प्रतिनिधित्व दिया जाना जरूरी लगा ।  क्या ये 'माननीय' मंत्री जी उस आइ..एस. सचिव के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ हो सकते हैं 

     स्थानीय स्तर पर देखें तो पंचायतों मे, नगर-पालिकाओं में महिलाओं के लिये सुरक्षित सीटों पर जो महिला प्रत्याशी चुनाव लड़ती हैं - वह केवल डमी होती हैं - चुनाव उनके पति लड़ते हैं, वही भाषण भी देते हैं, जन संपर्क आदि करते हैं ।  यदि कोई मुस्लिम महिला उम्मीदवार हो तो पोस्टरों पर फोटो भी उसके पति का ही देखा जाता है।  चुनाव जीत जायें तो सारा राजकाज उनके पति ही चलाते हैं।  बैठकों में महिला सभासद या प्रधान नहीं, प्रधान पति बैठते हैं और हम हैं कि इन संविधानेत्तर सत्ता केंद्रों को खड़े करके प्रसन्न हैं - इस खुशफहमी में जी रहे हैं कि हमने महिलाओं को सत्ता सौंप दी, जबकि ये महिलायें अपने पति के आदेश पर, न जाने किन-किन कागज़ों पर अंगूठा भर लगाती हैं।  हम इसे लोकतंत्र मान बैठे हैं और खुश हैं।   होते रहिये आप खुश, मेरी दृष्टि में तो  यह संविधान के हास्यास्पद प्रावधानों के निकृष्टतम उदाहरण हैं ।  

     बी एस ने अपनी टिप्पणी में जिस लायब्रेरी का जिक्र किया हैयदि वर्तमान व्यवस्था इसी प्रकार चलती रही तो ये लायब्रेरी धूल फांकेंगी। बाहुबलियों के इस युग में लायब्रेरी का क्या कामअब बुद्धिबल की नहीं, बाहुबल की, जातिबल की, धनबल की आवश्यकता का जमाना आ चुका है।  

     अब रहा सवाल कि मैंने लोकतन्त्र के लिये क्या किया है तो मैं विनम्रता पूर्वक यही कह सकता हूं कि देश की जनता को संविधान की इन कमियों के प्रति सतर्क करना, उनमे परिवर्तन की आकांक्षा जगाना, इसके लिये जनमत निर्माण का सतत प्रयास करना भी लोकतंत्र की छोटी सी सेवा ही तो है।  जैसी देशघाती व्यवस्था हमारे देश में चल रही है, वह हमारे वर्तमान जन-प्रतिनिधियों को बहुत रास आ रही है।  वह उसमे कोई परिवर्तन नहीं चाहते हैं ।  यदि चुनाव आयोग या हमारे माननीय सभापति महोदय चुनाव प्रक्रिया में सुधार की कोई अकांक्षा रखते हैं तो ऐसी हर पहल को तारपीडो कर देना, उसके मार्ग में यथा-संभव रोड़े अटकाना, उसमें से चोर दरवाज़े ढूंढ कर अपनी हरकतों को जारी रखने में ही उनका स्वार्थ निहित है ।  ऐसे में यह कार्य आपको और हमें ही करना होगा।  

            कुछ उपायों की ओर इंगित किया जा सकता है जिनको अपना कर हम कुछ बेहतरी की आशा कर सकते हैं।  मेरी तुच्छ बुद्धि में भी दो चार बातें आ रही हैं। 

     एक आई. . एस. बनने के लिये कठिनतम बौद्धिक परीक्षाओं से गुज़रना होता है। एक जिलाधिकारी बनना किसी भी युवा का सपना हो सकता है।  एक आइ. . एस. की तुलना में निपट मूर्ख, निरक्षर भट्टाचार्य जन-प्रतिनिधि उसकी छाती पर मंत्री बन कर बैठ जाता है, उसको उल्टे-सीधे आदेश देता है, न माने तो उसका ट्रांसफर कर देने के अधिकार रखता है - क्या ये किसी लायक लोकतंत्र के लक्षण हैंक्या बॉस को कम से कम अपने सचिव जितना शिक्षित होना अनिवार्य नहीं होना चाहियेयदि ऐसी व्यवस्था कर दी जाये कि एम.पी. या एम.एल.. का चुनाव वही व्यक्ति लड़ सकता है जो आइ..एस. की प्रिलिमिनरी परीक्षा पास कर चुका हो तो क्या चुनाव लड़ने के इच्छुक टिकटार्थियों की संख्या में पर्याप्त कमी नहीं दिखाई देगीक्या हमारे जन-प्रतिनिधियों के बौद्धिक स्तर में गुणात्मक परिवर्तन दिखाई नहीं देंगे 

            आज हम स. मनमोहन सिंह का इतना सम्मान क्यों करते हैंवह एक लब्धप्रतिष्ठ अर्थशास्त्री हैं, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके हैं, देश की अर्थव्यवस्था की बारीकियों को भली प्रकार समझ सकते हैं - उनका आइ..एस. सचिव उनके सिर पर सवार नहीं हो सकता क्योंकि उसे पता है कि उसका बॉस उससे अधिक विद्वान यदि न भी होगा तो उसके जितना तो विद्वान है ही । 

            आप कोई भी सरकारी नौकरी के लिये आवेदन करें तो आपकी स्वास्थ्य परीक्षा होती है। (स्वास्थ्य परीक्षा सेना में भर्ती के लिये ही नहीं, सरकार के सभी विभागों में सेवा  पाने के लिये अनिवार्य है।परंतु हमारे लायक लोकतंत्र में चुनाव लड़ने के लिये, एम.पी., एम.एल.. बनने के लिये, मंत्री बनने के लिये बीमार होना कहीं आड़े नहीं आता।  फल यह है कि चुनाव जीतते ही, हमारे जन-प्रतिनिधि सरकारी खर्च पर ऑपरेशन कराने के लिये अमेरिका या इंग्लैंड भागते हैं और देशवासियों की खून-पसीने की कमाई से बटोरे गये टैक्स इस प्रकार इन लोगों  पर लुटाये जाते हैं।  क्या इसमें कुछ बुराई है कि चुनाव लड़ने के इच्छुक व्यक्ति को कठिन स्वास्थ्य परीक्षा से गुज़ारा जाये और जो इस परीक्षा में असफल हों वह अपने घर बैठ कर अपना इलाज़ करायें 

            आम लोक सेवकों की भांति जन-प्रतिनिधियों की भी सेवा-निवृत्ति की आयु तय की जाये इसमें क्या बुराई हो सकती है 

     अभी कुछ वर्ष पूर्व कानून में संशोधन कर के यह प्रावधान कर दिया गया कि सदन पांच वर्ष तक चले या न चले, सांसदों, विधायकों की पेंशन तो पक्की हो ही जायेगी। आजकल देख रहा हूं कि हिंदुस्तान समाचार पत्र में हमारे देश के सभी सांसदों की सक्रियता (परफॉर्मेंस) से संबंधित बहुत महत्वपूर्ण व रोचक जानकारी पाठकों तक क्रमिक रूप से पहुंचायी जा रही है जिसे देख कर स्पष्ट है कि हमारे अधिकांश सांसद या तो सदन से अनुपस्थित रहते रहे हैं, या फिर सदन में उपस्थित रह कर भी ऊंघते रहे हैं।  क्या इसमे कुछ बुराई है कि पेंशन की राशि तय करने के लिये नये सिरे से पैरामीटर बनाये जायें और यह परफोरमेंस (performance based)  पर आधारित हो 

     उपाय तो बहुत हो सकते हैं, चुनाव आयोग भी इस विषय में चिन्तित है।  यह भी तय है कि हमारे जन-प्रतिनिधि ऐसे हर किसी प्रयास का पुरजोर विरोध करेंगे।  आखिर ये उनकी रोज़ी-रोटी से जुड़ा सवाल है!!  वे भला क्यों चाहने लगे कि उनकी गर्दन पर आरी चले? पर बंधु, लोकतंत्र केवल उसी समाज में सफल होता है जहां 'लोक' जागृत हो, 'तंत्र' में जो दोष दिखें, उनको दूर करते रहने की मानसिक तैयारी हो। हम भारतीय तो राजतंत्र के अभ्यस्त हैं। जो एम.एल../एम.पी बन जाता है, उसको अपने मुहल्ले में बुला कर उसका अभिनन्दन करने की होड़ में लग जाते हैं - अपना काम निकलवाने के लिये उसके कृपा-पात्र बनना चाहते हैं।   यदि हमें पता है कि वह व्यक्ति अनाचारी, दुराचारी है, जेल भी काट आया है तो भी उसको घर बुला कर उसका आतिथ्य करने में सौभाग्य मानते हैं।  अभिनन्दन करते समय यह नहीं सोचते कि आखिर ये व्यक्ति अभी चुना ही तो गया है, पांच साल काम कर ले, उसके बाद देखेंगे कि अभिनंदन करना है या गधे की सवारी करानी है।  

बुधवार, 18 मार्च 2009

आवश्यकता है ५४२ नालायकों की !

देश को ५४२ नालायकों की तुरंत आवश्यकता है।  चयन होते ही आने वाली सात पीढ़ियों तक का जुगाड़ होने की पूरी गारंटी है। वेतन पर कोई आयकर नहींजब मर्ज़ी, जितना मरज़ी वेतन स्वयं बढ़ा लेने की सुविधा उपलब्ध है। काम की कोई जिम्मेदारी नहीं है।  ऑफिस में आओ, या न आओ, आपकी इच्छा पर निर्भर करेगा।  शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है, अंगूठा छाप भी चलेगा।  रिश्वत लेने देने की पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी इस बारे में विशेषाधिकार आपकी रक्षा करेगा ।

 एकमात्र अनिवार्य अर्हता है - जनता को अपनी लच्छेदार बातों से, धन बल से, बाहु बल से - येन-केन प्रकारेण बहला कर, फुसला कर, आतंकित करके, प्रताड़ित करके, बूथ लूट कर, घपलेबाजी करकेयानि किसी भी प्रकार से वोट हासिल करने होंगे।  यदि आप हत्या, बलात्कार आदि-आदि किसी जुर्म में जेल की सज़ा काट रहे हैं तो भी कोई विशेष दिक्कत नहीं है - आप अपने गुर्गों की सहायता से चयन प्रकिया में भाग ले सकेंगे।  

चयनित व्यक्ति का मुख्य कार्य भाषण देना, सार्वजनिक अभिनंदन कराना, मालायें पहनना, जब तब विदेश यात्रा करना, लोगों के अंट-शंट काम निपटाने में उनकी मदद करना आदि रहेंगे। आदर्शवादी आवेदन करने की चेष्टा / धृष्टता न करें, उनका आवेदन पत्र प्रथम दृष्टया निरस्त कर दिया जायेगा।  

इच्छुक व्यक्ति २०-३० लाख रुपये पार्टी चंदे के रूप में जेब में डाल कर लाइन में लग जायें।