शनिवार, 2 अक्तूबर 2010
सेकुलरिस्ट पार्टियों को अयोध्या फैसला अपने लिये हानिकर प्रतीत हो रहा है।
इन घटिया राजनीतिबाजों की लिस्ट में सबसे पहला नाम मुलायम सिंह यादव का आता है। ये महाशय फरमा रहे हैं कि "न्यायपालिका के इस फैसले से देश के मुसलमान स्वयं को ठगा हुआ अनुभव कर रहे हैं।" वास्तव में वह चाहते हैं कि देश के मुस्लिमों को इस फैसले को अस्वीकार कर देना चाहिये । यह वही मुलायम सिंह हैं जिन्होने आडवाणी की राम रथ यात्रा के दौरान, रथयात्रा के जवाब में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों में तथाकथित ’सद्भावना यात्रायें’ आयोजित की थीं और जिस-जिस जिले में भी गये थे, वहीं दो दिनों के अन्दर अन्दर साम्प्रदायिक दंगे भड़कते चले गये थे। देश के तथाकथित सेकुलरिस्टों ने इन सभी दंगों के लिये राम रथयात्रा को दोषी ठहराया था जबकि इन दंगों के सूत्रधार मुलायम सिंह यादव खुद थे। राम रथयात्रा तो उत्तर प्रदेश तक पहुंच ही नहीं पाई थी और जहां - जहां से राम रथयात्रा निकली थी, वहां साम्प्रदायिक दंगे नहीं हुए थे। दंगे हुए भी थे तो उत्तर प्रदेश के उन जिलों में जहां मुलायम सिंह यादव ने अपने वक्तव्यों से रामजन्म भूमि आन्दोलन के विरुद्ध जहर उगला था।
सूची में अगला नाम आता है पी. चिदम्बरम का । हिन्दू और मुस्लिम नेतृत्व कह रहा है कि पुरानी कटुता को भुला कर हमें उज्ज्वल भविष्य की ओर आगे बढ़ना चाहिये और विभिन्न समुदायों के बीच परस्पर सहयोग के एक नये युग की शुरुआत होनी चाहिये । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन भागवत भी अत्यन्त मृदु भाषा में हिन्दू - मुस्लिम सद्भाव को और पुष्ट करने की जरूरत पर बल दे रहे हैं परन्तु पी. चिदम्बरम देश के मुसलमानों को बाबरी मस्जिद के ढहाये जाने की याद दिला-दिला कर प्रयास कर रहे हैं कि मुस्लिम और हिन्दू समुदाय के बीच में जो समझदारी पूर्ण समरसता का मार्ग खुल रहा है, वह फिर से बन्द हो जाये । वास्तव में पी चिदम्बरम एक राष्ट्रीय शर्म हैं। जब वह कहते हैं कि यह सब झूठ है कि भारत कभी सोने की चिड़िया था, यहां घी - दूध की नदियां बहती थीं, ज्ञान - विज्ञान का बोलबाला था, भारत विश्वगुरु कहलाता था तो वह यही सिद्ध करते हैं कि मैकाले ने भारतीयों के लिये जिस प्रकार की शिक्षा का प्रबन्ध किया था, वह उस शिक्षा का सबसे घटिया उत्पाद और राष्ट्रीय शर्म बन कर देश के सम्मुख उपस्थित हैं और हर दृष्टि से एक काले अंग्रेज़ हैं। ऊपर से करेला और नीम चढ़ा ये कि वे कांग्रेसी भी हैं और यह यह सोच-सोच कर परेशान हैं कि कहीं इस अयोध्या फैसले का लाभ भाजपा न ले जाये । इसलिये वह मुस्लिम समुदाय को भड़का रहे हैं कि कहीं संघ और भाजपा के साथ प्रेम की पींगें न बढ़ाने लग जाना क्योंकि ये वही लोग हैं जिन्होंने तुम्हारी बाबरी मस्जिद को ढहाया था। वास्तव में कांग्रेसियों ने अंग्रेज़ों से सबसे पहला सबक जो सीखा था वह यही है - "फूट डालो और राज करो।" यदि भाजपा और संघ मिल कर हिन्दू और मुस्लिम समुदाय के बीच में विश्वास का माहौल बनाना भी चाहें तो कांग्रेस को अपनी गद्दी डगमगा रही लगने लगती है। वह यह कभी भी स्वीकार नहीं कर सकती कि हिन्दू और मुस्लिमों के बीच में सद्भाव बने क्योंकि यदि ऐसा होगा तो संघ और भाजपा को खलनायक के रूप में कैसे चित्रित करेंगे?
जब तक देश में इस प्रकार की घटिया वोटपरक राजनीति चलती रहेगी, हिन्दू और मुसलमानों के बीच अविश्वास की खाई भी खोदी जाती रहेगी । होना यह चाहिये था कि अदालत के इस फैसले के बाद अयोध्या में रामजन्मभूमि स्थल पर एक भव्य मंदिर और फैज़ाबाद में एक शानदार मस्जिद बनाने का एजेंडा सामने रख कर आगे बढ़ा जाता, पर देश के सेकुलरिस्टों को यह चिन्ता खाये जा रही है कि यदि हिन्दू और मुस्लिम एक हो गये तो उनकी सेकुलर वाद की राजनीति की दुकान बन्द हो जायेगी । क्या हमारे नेता वास्तव में लोकतंत्र का अर्थ समझ पाये हैं?
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सोमवार, 4 जनवरी 2010
घर से भागी हुई एक लड़की का ख़त
प्रिय मित्रों,
श्री योगेश छिब्बर ने एक कहानी लिखी है जो कुछ यों शुरु होती है -
पापा:
आपके पिता होने में न सुंदरता है, न कोमलता, न कोई मीठा गीत। आपकी बेटी होना अपमान है, अपराध है, पाप है; आप मेरे स्त्री होने की सुंदरता पर हावी नहीं हो सकते। इसीलिए मैं आपको अपनी बाक़ी ज़िंदगी में से घटा देना चाहती हूँ। मैं चाहती हूँ आप शून्य हो जाएँ, मेरे वजूद में से बाहर हों, ताकि मैं खूबसूरत और मुकम्मल हो सकूँ।
श्री योगेश छिब्बर की पूरी कहानी यहां प्रकाशित हुई है व इस कहानी पर प्रतिक्रिया भी ।
जहां तक, इस कहानी का संबंध है, मैं इसे पसन्द नहीं कर पा रहा हूं। फर्क दृष्टिकोण का है। मुझे यह समझ नहीं आ रहा कि आखिर योगेश छिब्बर पाठकों को इस कहानी के माध्यम से संदेश क्या देना चाह रहे हैं। जो संदेश मुझे इस कहानी से मिलता प्रतीत हो रहा है वही यदि इस कहानी का वास्तविक संदेश है तो मुझे यह संदेश न तो जनहित में लगता है और न ही स्वीकार्य ही है।
- सुशान्त सिंहल
आप भी इसे पढ़ें व अपनी प्रतिक्रिया दें तो यह सार्थक संवाद आगे बढ़ सकेगा ।
सुशान्त सिंहल
शनिवार, 2 जनवरी 2010
What are you doing today ?
DEAR ALL,
ALL OF US MUST REMEMBER THAT WE HAVE NOT INHERITED THIS EARTH FROM OUR ANCESTORS. WE HAVE BORROWED IT FROM OUR CHILDREN. WHAT KIND OF EARTH WE ARE GOING TO GIVE BACK TO OUR CHILDREN ? WILL THEY BE PROUD OF US ? OR, WILL THEY CURSE US FOR OUR SHORTSIGHTEDNESS? FOR OUR APATHY TOWARDS OUR ENVIRONMENT ? FOR OUR SELF-CENTREDNESS ? FOR OUR COMPLETE NEGLECT OF THEIR WELL-BEING ?
THINK ! THINK !! THINK !!! IF WE REALLY LOVE OUR CHILDREN AS WE CLAIM TO DO, DO SOMETHING FOR THEM. MAKE THIS EARTH A BETTER PLACE FOR THEM TO LIVE.
LET'S START WITH OUR OWN CITY, OUR OWN MOHALLA, OUR OWN LANE AND WITH OUR OWN HOUSE.
STRIVE FOR BETTER ENVIRONMENT, WE OWE IT TO OUR CHILDREN.
SUSHANT SINGHAL
Editor
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सोमवार, 21 दिसम्बर 2009
Christmas and New Year Special
Dear Friends,
अब की सेंटा क्लॉज़ गांव में मेरे आना,
क्रिसमस डे इस बार हमारे साथ मनाना।
A beautiful poetry by Sh. Kashmir Singh.
Editor
The Saharanpur Dot Com
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रविवार, 20 दिसम्बर 2009
इन विचारणीय बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैं?
प्रिय मित्रों,
शिक्षा के क्षेत्र में हमारे देश में अनेकानेक विरोधाभास दृष्टिगोचर होते हैं। कुछ संस्थान ऐसे हैं जो शिक्षा के उच्च स्तर के लिये प्रसिद्ध हैं, वहां प्रवेश पाना किसी भी विद्यार्थी का स्वप्न हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, देश के हज़ारों नगरों, कस्बों में ऐसे विद्यालय, महाविद्यालय हैं जहां पढ़ाई आम तौर पर होती ही नहीं। छात्र - छात्रायें अगर इन विद्यालयों में जाते भी हैं तो सोशल नेटवर्किंग के लिये, नेतागिरी सीखने के लिये या येन-केन-प्रकारेण एक अदद डिग्री हासिल करने के लिये। अध्यापक - अध्यापिकायें इन कॉलेजों में आते हैं तो उपस्थिति पंजिका में हस्ताक्षर करने और वेतन लेने के लिये, धूप सेंकने के लिये, ट्यूशन के लिये आसामी ढूंढने के लिये या फिर साथियों के साथ गप-शप करने के लिये।
प्राइमरी या माध्यमिक स्तर की शिक्षा का जहां तक संबंध है, दिखाई ये दे रहा है कि प्राइवेट स्कूलों में (जिनको अंग्रेजी माध्यम या पब्लिक स्कूल भी कहा जाता है) शिक्षा का माहौल सरकारी स्कूलों या हिन्दी मीडियम के स्कूलों की तुलना में बहुत बेहतर है। अंग्रेज़ी माध्यम के सारे स्कूलों का स्तर अच्छा हो, ऐसा नहीं है। (हर शहर, कस्बे में असंख्य स्कूल ऐसे भी हैं जो ढेर सारा धन कमाने के इच्छुक शिक्षित अथवा अर्द्धशिक्षित लोगों ने अपने घर के कुछ हिस्से में ही खोल लिये हैं और एक बोर्ड टांग कर, अपने घर की नौकरानी को आया और पत्नी को प्रधानाचार्या बना कर और खुद प्रबंधक बन कर विद्यालय आरंभ कर दिया गया है। मुहल्ले पड़ोस की लड़कियों को छः सौ - आठ सौ रुपये प्रतिमास देकर अध्यापिका बना लिया गया है। परन्तु इतना तो मानना ही पड़ेगा कि इन स्कूलों के अध्यापकों, अध्यापिकाओं को पढ़ाना आता हो या न आता हो; अपेक्षित सुविधायें हों अथवा न हों; स्कूल का प्रबंधन वर्ग पढ़ाई के माहौल को लेकर, अनुशासन को लेकर, और अपने विद्यालय की छवि निर्माण को लेकर सजग अवश्य है।)
डिग्री कॉलेजों का जहां तक संबंध है, अंधेर नगरी, चौपट राजा वाली कहावत यहां चरितार्थ होती दिखाई देती है। छात्रों से पूछो तो वह अध्यापकों को दोष देते हैं; अध्यापकों से पूछो तो छात्रों को, प्रिंसिपल को, विश्वविद्यालय को या शिक्षा व्यवस्था को दोष देते हैं। प्रिंसिपल से पूछो तो वह स्थानीय नेताओं को और उनके संरक्षण में पलने वाले गुंडेछाप छात्रों को कॉलेज का वातावरण प्रदूषित करने के लिये दोषी ठहराते हैं, हर दूसरे-तीसरे दिन छुट्टी करने के लिये सरकार को, विश्वविद्यालय को, अध्यापकों को दोषी ठहराते हैं। प्रबंधन वर्ग से पूछो तो वह शिक्षण तंत्र में, सरकार में, विश्वविद्यालय की नीतियों में दोष ढूंढते हैं।
इस सब के बारे में विचार करें तो निम्न प्रश्न उभरते हैं :
१- क्या हमारे अध्यापक अध्यापन को लेकर गंभीर हैं? या, वह सिर्फ ट्यूशन को लेकर ही गंभीर हैं? क्या ऐसे भी अध्यापक विद्यालयों में, महाविद्यालयों में नौकरी पा गये हैं जो अध्यापन कार्य के लिये पूर्णतः अनुपयुक्त हैं ? यदि हां, तो इस समस्या का क्या हल है?
२- क्या छात्र-छात्रायें अध्ययन को लेकर गंभीर हैं? यदि नहीं तो फिर वह कॉलेजों में प्रवेश लेते ही क्यों हैं? जो छात्र-छात्रायें पढ़ाई को लेकर गंभीर हैं पर उनको अपेक्षित माहौल नहीं मिल पा रहा, क्या उनके पास इस समस्या का कोई समाधान हो सकता है?
३- क्या इस मामले में हमारे शिक्षा तंत्र में, शिक्षण पाठ्यक्रम में भी कुछ दोष हैं?
इन विचारणीय बिन्दुओं पर आप क्या सोचते हैं? आपके विचार हमारे लिये बहुत महत्वपूर्ण हैं। अतः कृपया हमें अवश्य ही लिखें।
संपादक
द सहारनपुर डॉट कॉम
Editor
The Saharanpur Dot Com
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सोमवार, 14 दिसम्बर 2009
हार्दिक क्षमा याचना
सहारनपुर वासियों से हार्दिक क्षमा याचना
सहारनपुर : १३ दिसंबर : होटल स्काइलार्क, अंबाला रोड सहारनपुर को सभागार बुकिंग हेतु अग्रिम भुगतान करने के बावजूद अंतिम समय में पूर्व निश्चित सभागार देने से मना कर देने के कारण द सहारनपुर डॉट कॉम का लोकार्पण कार्यक्रम आपात्कालीन ढंग से रामतीर्थ केन्द्र, अंबाला रोड में अंतरित किया गया। कार्यक्रम के आयोजकों द्वारा आपात्कालीन ढंग से फोन और एस.एम.एस. द्वारा सैंकड़ों अभ्यागतों को स्थान परिवर्तन की सूचना दी गई, होटल के बाहर सहायक खड़े किये गये जो आमंत्रितों को स्थान परिवर्तन की जानकारी दे सकें। जनरेटर व जलपान की व्यवस्था के जैसे - तैसे करके वैकल्पिक प्रबंध किये गये। नगर के सैंकड़ों बुद्धिजीवी, पत्रकार, साहित्यकार, कलाकार, उद्यमी एवं व्यापारी जिनको ससम्मान आमंत्रित किया गया था, होटल स्काइलार्क, अंबाला रोड सहारनपुर पहुंचे और वहां कार्यक्रम होता न देख कर किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति में वापिस लौट गये। होटल स्काइलार्क के प्रबंधकों ने वहां पहुंचने वाले अतिथियों को स्थान परिवर्तन की सूचना देने में अपनी ओर से कोई भी सहयोग देने की भी कोशिश नहीं की।
सुशान्त सिंहल ने वैष्णवी नृत्यालय की सम्मानित नृत्य प्रशिक्षिका रंजना नैब, सहारनपुर की गौरव, फाल्गुनी भारद्वाज , और नृत्यांगना श्री से सम्मानित श्रेया सिंहल व अन्य कलाकारों से भी क्षमा याचना की है कि लोकार्पण कार्यक्रम हेतु पन्द्रह दिन से जिन नृत्य प्रस्तुतियों को तैयार करने के लिये ये सहारनपुर के प्रतिष्ठित बाल कलाकार दिन-रात एक किये हुए थे, उन नृत्य प्रस्तुतियों के कार्यक्रम भी कार्यक्रम स्थल में परिवर्तन के कारण रद्द करने पड़े। रंजना नैब, संदीप शर्मा व सुनीत गुप्ता (अभिभावकगण) को प्रस्तुतियों को निरस्त किये जाने से जो मानसिक आघात पहुंचा, उसके लिये द सहारनपुर डॉट कॉम क्षमा-ज्ञापन करता है। उल्लेखनीय है कि स्वामी रामतीर्थ केन्द्र के सभागार में नृत्य कार्यक्रमों की परंपरा नहीं है अतः इस संस्थान की भावनाओं का सम्मान करते हुए फाल्गुनी भारद्वाज और श्रेया सिंहल जैसे बाल - कलाकारों की प्रस्तुतियाँ निरस्त कर दी गई थीं जो सहारनपुर की अंकुरित हो रही प्रतिभाओं का परिचय देने के लिये द सहारनपुर डॉट कॉम द्वारा विशेष अनुरोध करके वैष्णवी नृत्यालय से आमंत्रित की गई थीं।
द सहारनपुर डॉट कॉम के संपादक सुशान्त सिंहल ने पत्रकारों से बात करते हुए जहां एक ओर रामतीर्थ केन्द्र के सम्मान्य संस्थापक आचार्य डा. केदारनाथ प्रभाकर के प्रति उनके इस अभूतपूर्व सहयोग के लिये कृतज्ञता व्यक्त की, वहीं दूसरी ओर सभी ऐसे आमंत्रित महानुभावों से क्षमा - याचना की है जो कार्यक्रम स्थल में अंतिम समय में किये गये इस परिवर्तन की जानकारी न मिल पाने के कारण वापिस लौटने को विवश हुए। उन्होंने इस बात के लिये सहारनपुर के सभी पत्रकार बंधुओं का भी आभार व्यक्त किया कि उन्होंने अपनी ओर से भी कार्यक्रम स्थल में किये गये इस परिवर्तन की सूचना को फैलाने में सहयोग दिया।
द सहारनपुर डॉट कॉम के संपादक सुशान्त सिंहल ने होटल स्काइलार्क की इस लालची प्रवृत्ति की आलोचना की और कहा कि एक बड़ी बुकिंग के लालच में पहले से ही बुक किये गये सभागार को किसी अन्य ग्राहक को दे देना और आयोजकों को इसकी सूचना देने का भी कष्ट न करना अस्वस्थ मानसिकता है और व्यापार की सामान्य आचार-संहिता के खिलाफ है। ऐसा करके यह प्रतिष्ठान सहारनपुर के सभी होटलों के प्रति एक अविश्वास की भावना उत्पन्न कर रहा है, अपनी और सहारनपुर के अन्य होटल व्यवसायियों की छवि को भी धूमिल कर रहा है । अब सभी ग्राहक होटल स्काइलार्क में अपने कार्यक्रमों हेतु बुकिंग कराने से पहले सौ बार सोचेंगे कि कहीं ऐसा न हो, ऐन कार्यक्रम के समय उनको कह दिया जाये कि आपके द्वारा बुक किया गया सभागार तो ज्यादा धन देने वाले किसी बड़े ग्राहक को दे दिया गया है, अब आप चाहो तो इस छोटे से बेसमेंट में अपना कार्यक्रम आयोजित कर लीजिये। द सहारनपुर डॉट कॉम का यह सौभाग्य रहा कि अंतिम क्षणों में भी रामतीर्थ केन्द्र का प्रतिष्ठित एवं सम्मानित सभागार आयोजन हेतु उपलब्ध हो गया और यह कार्यक्रम नगर के सभी पत्रकार बंधुओं के अनन्य सहयोग के कारण पूरी भव्यता के साथ संपन्न हो गया, वरना सहारनपुर के विकास के लक्ष्य को लेकर चल रहे द सहारनपुर डॉट कॉम के लोकार्पण कार्यक्रम में विघ्न डालने का कलंक होटल स्काइलार्क के माथे लगता और कार्यक्रम हेतु पधारने वाले अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के अतिथियों के सम्मुख सहारनपुर की छवि तार-तार हो जाती।
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शनिवार, 5 दिसम्बर 2009
"सिर्फ अम्मा ही क्यों ? पिताजी क्यों नहीं?"
मित्रों,
"सिर्फ अम्मा ही क्यों ? पिताजी क्यों नहीं?" हमारे अनेक पाठकों ने हमारे सम्मुख प्रश्न किया है कि आप www.the-saharanpur.com/amma.html पर केवल "अम्मा" को ही समर्पित रचनायें छाप कर क्यों रुक गये हैं? क्या हमारे जीवन में पिता का स्थान अम्मा से कमतर होता है? अब आप ही बताइये, हम अपनी दो आंखों में किसे से ज्यादा महत्वपूर्ण मान सकते हैं भला? पर हमारे सुधि पाठकों की यह प्यार भरी शिकायत जायज़ है और इसीलिये आज हम एक अद्भुत काव्य रचना से अपने पूर्वजों को प्रणाम करने का यह क्रम पुनः शुरु कर रहे हैं। उम्मीद है कि आप लोग अपने पूज्य पिता श्री के प्रति अपने भाव-पुष्प समर्पित करने में पीछे नहीं रहेंगे। तो मित्रों, ये रही इस अभियान की प्रथम रचना !
मेरे बाबूजी !
सौ सुमनों का एक हार हैं मेरे बाबूजी,
बाहर भीतर सिर्फ प्यार हैं मेरे बाबूजी !
सारे घर को जिसने अपने स्वर से बांध रखा,
उस वीणा का मुख्य तार हैं मेरे बाबूजी !
पूरी रचना पढ़ने के लिये क्लिक करें >>>>
यदि आपने अम्मा को समर्पित कवितायें जो हमें प्राप्त हुईं, अभी तक न पढ़ी हों तो आप यहां पढ़ सकते हैं। चाहें तो अपनी कविता भी भेज सकते हैं।
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मंगलवार, 17 नवम्बर 2009
"जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं" - विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना एवं विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या - प्रतिष्ठा शर्मा
"जो कुछ करते नहीं वो मर जाते हैं" विश्व की सबसे छोटी आयु की योगाचार्या एवं विश्वविख्यात कत्थक नृत्यांगना प्रतिष्ठा शर्मा के मनोरंजक संस्मरण जो वह खाड़ी देशों की यात्रा से लौट कर आपके साथ बांट रही हैं। www.thesaharanpur.com/gulf.html
"सहारनपुर की धरती पर पांच सौ कलाकार अपने कैनवस और तूलिका के साथ अपनी कल्पनाओं को रंग भरने में जुटे।" - सृजन २००९ फोटो गैलरी में मिलिये इन बाल एवं युवा कलाकारों से। www.thesaharanpur.com/drawingcomp.html
बृहस्पतिवार, 12 नवम्बर 2009
जिसे वन्दे मातरम् गाना होगा, अवश्य गायेगा - फतवा हो या न हो !
इस्लामिक नेताओं द्वारा वन्दे मातरम् के विरोध के विरोध में अनेकों स्तर पर क्षोभ व रोष का प्रदर्शन हुआ है। दारुल उलूम देवबन्द द्वारा वन्देमातरम् गायन हेतु मुसलमानों को अनुमति दे दिये जाने के समाचार से देश वासियों ने राहत की सांस ली ही थी कि अगले ही दिन दारुल उलूम के वन्दे मातरम् विरोधी बयान फिर आ जाने से यह स्पष्ट हो गया कि कट्टरपंथी ताकतें सिर्फ पाकिस्तान सरकार पर ही हावी नहीं हैं, बल्कि दारुल उलूम देवबन्द भी इनका शिकार है।
इतिहास गवाह है कि इस्लामिक भावनाओं का सम्मान करते हुए वन्दे मातरम् को राष्ट्रगीत के रूप में स्वीकार करते समय उसमें केवल वे ही दो पद आधिकारिक रूप से स्वीकार किये गये थे जिनमें किसी भी प्रकार से मुस्लिम विरोध की भावना की कोई गुंजाइश नहीं थी। पर अगर विरोध करने के लिये विरोध करना ही लक्ष्य हो तो एक कारण न रहे तो न सही, दूसरा कारण ढूंढ लिया जायेगा। यही वन्दे मातरम् के साथ हो रहा है। वन्दे मातरम् का विरोध करने वाले कतिपय मुस्लिम मजहबी नेता व राजनीतिज्ञ सिर्फ अखबारों व टी.वी. चैनल पर अपने नाम और चेहरे देखने के लालच में ऐसे अतिवादी बयान और फतवे दिया करते हैं और यह आभास देते हैं कि उनके फतवों का उनके अनुयायी आदर-सम्मान करते हैं। जब कि सच यह है कि इस्लामिक मजहबी नेताओं को राजनीतिज्ञ लोग तो सिर्फ इस लिये लिफ्ट देते हैं कि शायद उनके समर्थन और सहयोग से कुछ मुस्लिम वोट पक्के हो जायेंगे। मीडिया इस लिये उनकी बातों को लेकर सुर्खियां बनाता है कि इससे सनसनी पैदा होगी और अखबार बिकेगा, टी.आर.पी. रेटिंग ऊंची जायेगी । पर जहां तक आम मुसलमान का सवाल है, अब उसकी मानसिकता बदल गई है। वह देख रहा है कि समर्थ को कोई दोष नहीं लगता । सानिया मिर्ज़ा द्वारा टेनिस खेलते हुए जो मिनी स्कर्ट पहनी जाती है उसका विरोध किया गया पर जब सानिया ने एक नहीं सुनी तो चुप होकर बैठ गये। ए. आर. रहमान ने वन्दे मातरम् गीत का न केवल शानदार संगीत तैयार किया, अपितु इस अत्यन्त लोकप्रिय गीत को अपनी मधुर आवाज़ भी दी। ए.आर. रहमान का इन फतवा - विशेषज्ञों ने क्या बिगाड़ लिया ? ए.आर. रहमान से पहले भी मुहम्मद रफी जैसे महान गायक हुए जिनके गाये भजन आज तक कानों में गूंजते रहते हैं। न जाने कितने मुस्लिम अभिनेता - अभिनेत्रियां हैं जिन्होंने हिन्दू किरदार निभाते हुए हर वह रस्म निभाई जो शरियत में मना होगी। सिंदूर भी लगाया, बिछुए, कंगन, मंगलसूत्र भी पहने और मंदिरों में देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना भी की। किसने उनका क्या बिगाड़ लिया ?
सच तो यह है कि अपने अनुयायियों को भेड़- बकरियों की तरह हांकने की इन फतवेदारों की मनोवृत्ति को उनके खुद के अनुयायी पहचान रहे हैं। गणित और विज्ञान की शिक्षा का विरोध करके इन मजहबी नेताओं ने स्वयं ही बता दिया है कि वह किस अंधे कुएं में बैठे हैं और बाहर निकलने को राजी नहीं हैं। इन मजहबी और राजनीतिक नेताओं के पीछे चलते चलते मुसलमान प्रगति की दौड़ में पिछड़ता चला गया है क्योंकि इन नेताओं की दिलचस्पी वास्तव में केवल अपनी दुकान चलाने में है। और यह दुकान तब तक ही चलती है जब तक ऐसा आभास बना रहे कि आम मुसलमान उनकी बात सुनता और मानता है।
प्राचीन भारत में ऋषि मुनि कभी कभी नाराज़ होकर श्राप दे दिया करते थे। नाराज़ होने वालों में दुर्वासा ऋषि का नाम सबसे प्रमुख है। यह श्राप भी एक प्रकार का फतवा ही था जो ऋषि-मुनियों की नैतिक सत्ता के कारण प्रभावी होता था। राजा-महाराजा इस श्राप को लागू करने में उनकी मदद किया करते थे। गौतम ऋषि ने अपनी पत्नी अहिल्या का परित्याग किया तो किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि गौतम ऋषि के आदेश का विरोध कर सके। पर दशरथ पुत्र राम ने गौतम ऋषि के श्राप की रत्ती भर परवाह न करते हुए मां अहिल्या के न केवल दर्शन किये बल्कि उनके पुनर्वास का भी दायित्व उठाया। यह एक नैतिक सत्ता को दूसरी नैतिक सत्ता द्वारा चुनौती देने का अन्यतम उदाहरण है।
आधुनिक युग में भी देखें तो न्यायालय के फैसले तब तक ही सम्मान्य होते हैं जब तक वह प्राकृतिक न्याय के सिद्धान्त के अनुकूल हों, देश व समाज के हित साधक हों। माननीय उच्चतम न्यायालय के अनेकानेक फैसले ऐसे हैं जिनको कांग्रेस सरकार ने कभी भी अहमियत नहीं दी, उनको लागू कराने की कभी कोई चेष्टा नहीं की गई क्योंकि विधायिका का दृष्टिकोण न्यायपालिका के दृष्टिकोण से जुदा था। कई बार इन फैसलों को नकारने के लिये कानून में ही परिवर्तन कर दिया गया और कई बार सिर्फ अनसुना कर दिया गया। ऐसे में न्याय पालिका ने भी अपने फैसलों के सम्मान की रक्षार्थ "सुझाव" शब्द का उपयोग करना आरंभ कर दिया।
वास्तविकता के धरातल पर तो ऐसा पहले ही हो चुका है कि फतवे एक सुझाव से अधिक महत्व के नहीं रह गये हैं। फतवों का कितना महत्व होगा, यह सीधे-सीधे इस बात पर निर्भर करता है कि वह फतवा एक आम समझदार नागरिक की बुद्धि में फिट बैठता है या नहीं। यदि कोई मजहबी नेता मुसलमानों को यह आज्ञा दे कि गणित और विज्ञान पढ़ाना बन्द करो, डायनिंग टेबिल पर बैठ कर खाना मत खाओ, टीवी मत देखो, मोबाइल मत प्रयोग करो तो भला ऐसे फतवों का क्या हश्र होगा ? यदि एक आम मुसलमान को लगता है कि ए.आर. रहमान ने वन्दे मातरम् गाया और जन-जन का खूब प्यार और सम्मान अर्जित किया तो एक आम मुसलमान भी वन्दे मातरम् गाने से क्यों परहेज़ करने लगा ? जिसका मन चाहेगा, वन्दे मातरम् गायेगा, खूब गायेगा, डंके की चोट पर गायेगा - वन्दे मातरम् गाने वाले किसी भी मुसलमान का कम से कम भारत में तो ये फतवा विशेषज्ञ कुछ बिगाड़ नहीं पायेंगे।

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सोमवार, 2 नवम्बर 2009
लेती नहीं दवाई अम्मा, जोड़े पाई-पाई अम्मा ।
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बृहस्पतिवार, 24 सितम्बर 2009
अच्छे लोगों का अकाल है? सफेद झूठ !
इस महफिल में सुबह-शाम, यादों के मेले लगते हैं
बिछुड़ गये हैं फिर भी सब, हंसते-गाते-मिलते हैं।
जब से www.thesaharanpur.com वेबसाइट पर महफिलें सजनी शुरु हुई हैं, एक मौन क्रांति की आहट साफ सुनाई देने लगी है। ऐसे हज़ारों युवा हैं जो शहर की नर्क पालिका (मेरा मतलब था - नगरपालिका !) और कुछ गन्दगीपसन्द नागरिकों के हाथों शहर की दुर्दशा देख कर अकुलाहट अनुभव करते रहे हैं पर रास्ता नहीं सूझता था कि क्या करें। कहने को तो www.thesaharanpur.com मात्र एक वेबसाइट लगती है पर वास्तव में यह एक रचनात्मक आंदोलन है जिसमें सात समुन्दर पार बैठे सहारनपुर वासी भी उत्साह के साथ जुड़ने लगे हैं और जहां तक बन पड़े, सहयोग करने को तत्पर हो रहे हैं।
कौन कहता है कि समाज में अच्छे लोगों का अकाल पड़ गया है? सच तो यह है कि अच्छे लोग बहुमत में होते हैं, सिर्फ बिखरे हुए रहते हैं, दिशा विहीन और उत्साह विहीन रहते हैं। यदि कोई उनके आगे एक लक्ष्य और उस लक्ष्य तक पहुंचने का मार्ग स्पष्ट कर दे तो उनकी निराशा, उत्साहविहीनता, अलस सब छू मंतर हो जाते हैं।

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मंगलवार, 8 सितम्बर 2009
हिन्दी में एक नई वेबसाइट का आगमन
बहुत समय से ब्लॉग की तरफ ध्यान नहीं दे पा रहा हूं। आपके ब्लॉग पढ़ता हूं पर लिखने का समय नहीं निकाल पा रहा। आप सोच रहे होंगे कि ऐसी भी मुई क्या व्यस्तता हो गई ! सच तो ये है कि मेरे शहर सहारनपुर सी एक ऐसी वेबसाइट बनाने का विचार मार्च २००९ में मन में आया जिसमें वह सब कुछ हो जो सहारनपुर के बारे में दुनिया जानना चाह सकती है और जो सहारनपुर वासी अपने बारे में दुनिया को बताना चाहेंगे। साइट हिन्दी व अंग्रेज़ी में द्विभाषी बनाने की इच्छा थी। प्रोजेक्ट की विशालता को देखते हुए और अपने सीमित संसाधनों को देखते हुए ब्लॉग में समय लगाने के बजाय मैने इस वेबसाइट पर ध्यान केन्द्रित किया। मुझे लगा कि सहारनपुर से उच्च-शिक्षा के लिये, जॉब के लिये या विवाह आदि अन्य कारणों से हर साल हज़ारों युवक-युवतियां बाहर चले जाते हैं। सहारनपुर के बारे में जानते रहने की, सहारनपुर से जुड़े रहने की उनकी इच्छा कभी उनको ओर्कुट पर ले जाती है तो कभी फेस बुक पर । सहारनपुर के लिये वे कुछ करना भी चाहते हैं पर दिशा नहीं मिलती। ऐसे सभी युवाओं के लिये भी, जो देश के विभिन्न हिस्सों में (खासकर बंगलुरु, नॉएडा, गुड़गांव, दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद) या अमेरिका, इंग्लैंड आदि देशों में रह रहे हैं - यह वेबसाइट एक ऐसा मंच बन जाये जिसमें उनको यहां के समाचार कम से कम साप्ताहिक रूप से तो मिलते ही रहें। बस, यही सब सोच कर एक वेबसाइट बना डाली है http://www.thesaharanpur.com/ कभी अवसर मिले तो देखिये और सुझाव भी दीजिये कि इसमें और क्या - क्या दिया जा सकता है, इसे खूबसूरत व आकर्षक बनाने के लिये क्या - क्या किया जाना चाहिये - आदि।
आपका ही अभिन्न,
सुशान्त सिंहल
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बृहस्पतिवार, 19 मार्च 2009
आवश्यकता है ५४२ नालायकों की - कठोर टिप्पणी हेतु साधुवाद
मेरी पोस्ट "आवश्यकता है ५४२ नालायकों की" पर किन्हीं BS की टिप्पणी के लिये उनका हार्दिक धन्यवाद। इस प्रकार की पोस्ट पर एक रूढ़ि के रूप में, वाहवाही कर देने से बात वहीं की वहीं समाप्त हो जाती है जबकि विषय की गंभीरता मांग करती है कि इन प्रश्नों को मथा जाये। आपने बहस चलानी चाही, इसके लिये आपको साधुवाद !
बी एस ने जिन बिन्दुओं को अपनी टिप्पणी में स्पर्श किया है, उनसे मेरी असहमति नहीं है। मैं राज्य सभा का जिक्र नहीं कर रहा हूं। राज्य सभा और लोक सभा की चयन प्रक्रिया बिल्कुल अलग है। मेरा प्रयास सिर्फ हमारे संविधान की उन खामियों की ओर इंगित करना है जिनके चलते हमारे सांसदों की हर अगली पीढ़ी पहले वाली पीढ़ी की तुलना में निकृष्ट होती चली गयी है।
क्या ये सच नहीं है कि -
१- हमारे संविधान में सांसद या विधायक पद हेतु चुनाव लड़ने के लिये जो अर्हतायें निर्धारित की गयी हैं उनसे कहीं अधिक अर्हतायें किसी विद्यालय में चपरासी बनने के लिये निर्धारित होती हैं? हमारे देश के संविधान के प्रावधानों के अनुसार जो व्यक्ति स्कूल में चपरासी बनने के अयोग्य है, वह शिक्षा मंत्री बन सकता है और शिक्षा मंत्री बन कर उसी विद्यालय के वार्षिकोत्सव में मुख्य अतिथि के रूप में भाषण देने लगता है, विद्यालय के प्रधानाचार्य उसको माल्यार्पण करके स्वयं को धन्य हो गया मानने लगते हैं। जो व्यक्ति सिपाही बनने के लिये भी अयोग्य है, उसे हमारा संविधान परेड की सलामी लेने योग्य बना देता है, उसे प्रतिरक्षा मंत्रालय का कार्यभार संभालने के योग्य मान लिया गया है। क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं?
२- लालू प्रसाद यादव को बिहार का मुख्य मंत्री पद छोड़ कर जेल जाना पड़ा तो अपना राज-पाट अपनी लगभग निरक्षर पत्नी को सौंप गये। मुख्य मंत्री के पद पर देश ने एक ऐसी महिला को विराजमान देखा जो चूल्हे-चौके के अलावा कुछ जानती ही नहीं थी। क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं?
३- अपने लिये कानून स्वयं बना लेना, जब उच्चतम न्यायालय आपकी किसी हरकत को असंवैधानिक ठहराये तो उससे बच निकलने के लिये देश के कानून में ही परिवर्तन कर देना हमारे देश में बड़ी आसानी से देखने को मिलता रहता है। क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं?
अपना वेतन और भत्ते खुद तय करना; जब चाहो, जितनी चाहो, उनमें वृद्धि कर लेना हमारे लोकतंत्र में अनुमन्य है । क्या ये किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हो सकते हैं?
आप पढ़े लिखे हैं, विद्वान हैं, विभिन्न राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों का मनन करके, सभी प्रत्याशियों की कुंडली जांच कर वोट दे कर आते हैं, वहीं दूसरि ओर, आपके पड़ोस का कोई व्यक्ति देसी ठर्रे के एक पाउच के लालच में, या जात-बिरादरी के कहने पर एक गलत व्यक्ति को वोट दे आता है और इस प्रकार आपके वोट की महत्ता को समाप्त कर देता है - क्या ऐसी व्यवस्था के अंतर्गत आप श्रेष्ठ जन-प्रतिनिधियों की उम्मीद कर सकते हैं? क्या यह किसी लायक व्यवस्था के लक्षण हैं?
एक पांचवी पास दुकानदार, जो कल तक अपने मुहल्ले की दुकान पर कपड़ा बेच रहा था, आज हमारे लोकतंत्र की लायकी की वज़ह से विधायक और फिर मंत्री बन जाता है और एक आइ.ए.एस. उसका सचिव बन कर उसके मातहत कार्य करने लगता है। अब आप कल्पना कीजिये - इन तथाकथित 'माननीय' मंत्री महोदय को किसी भी शासकीय कार्य का कोई तज़ुर्बा नहीं है, कोई ट्रेनिंग की भी आवश्यकता नहीं समझी गयी है। मंत्री पद इस लिये मिल गया क्योंकि उनकी जाति को प्रतिनिधित्व दिया जाना जरूरी लगा । क्या ये 'माननीय' मंत्री जी उस आइ.ए.एस. सचिव के हाथों की कठपुतली से अधिक कुछ हो सकते हैं ?
स्थानीय स्तर पर देखें तो पंचायतों मे, नगर-पालिकाओं में महिलाओं के लिये सुरक्षित सीटों पर जो महिला प्रत्याशी चुनाव लड़ती हैं - वह केवल डमी होती हैं - चुनाव उनके पति लड़ते हैं, वही भाषण भी देते हैं, जन संपर्क आदि करते हैं । यदि कोई मुस्लिम महिला उम्मीदवार हो तो पोस्टरों पर फोटो भी उसके पति का ही देखा जाता है। चुनाव जीत जायें तो सारा राजकाज उनके पति ही चलाते हैं। बैठकों में महिला सभासद या प्रधान नहीं, प्रधान पति बैठते हैं और हम हैं कि इन संविधानेत्तर सत्ता केंद्रों को खड़े करके प्रसन्न हैं - इस खुशफहमी में जी रहे हैं कि हमने महिलाओं को सत्ता सौंप दी, जबकि ये महिलायें अपने पति के आदेश पर, न जाने किन-किन कागज़ों पर अंगूठा भर लगाती हैं। हम इसे लोकतंत्र मान बैठे हैं और खुश हैं। होते रहिये आप खुश, मेरी दृष्टि में तो यह संविधान के हास्यास्पद प्रावधानों के निकृष्टतम उदाहरण हैं ।
बी एस ने अपनी टिप्पणी में जिस लायब्रेरी का जिक्र किया है, यदि वर्तमान व्यवस्था इसी प्रकार चलती रही तो ये लायब्रेरी धूल फांकेंगी। बाहुबलियों के इस युग में लायब्रेरी का क्या काम? अब बुद्धिबल की नहीं, बाहुबल की, जातिबल की, धनबल की आवश्यकता का जमाना आ चुका है।
अब रहा सवाल कि मैंने लोकतन्त्र के लिये क्या किया है तो मैं विनम्रता पूर्वक यही कह सकता हूं कि देश की जनता को संविधान की इन कमियों के प्रति सतर्क करना, उनमे परिवर्तन की आकांक्षा जगाना, इसके लिये जनमत निर्माण का सतत प्रयास करना भी लोकतंत्र की छोटी सी सेवा ही तो है। जैसी देशघाती व्यवस्था हमारे देश में चल रही है, वह हमारे वर्तमान जन-प्रतिनिधियों को बहुत रास आ रही है। वह उसमे कोई परिवर्तन नहीं चाहते हैं । यदि चुनाव आयोग या हमारे माननीय सभापति महोदय चुनाव प्रक्रिया में सुधार की कोई अकांक्षा रखते हैं तो ऐसी हर पहल को तारपीडो कर देना, उसके मार्ग में यथा-संभव रोड़े अटकाना, उसमें से चोर दरवाज़े ढूंढ कर अपनी हरकतों को जारी रखने में ही उनका स्वार्थ निहित है । ऐसे में यह कार्य आपको और हमें ही करना होगा।
कुछ उपायों की ओर इंगित किया जा सकता है जिनको अपना कर हम कुछ बेहतरी की आशा कर सकते हैं। मेरी तुच्छ बुद्धि में भी दो चार बातें आ रही हैं।
एक आई. ए. एस. बनने के लिये कठिनतम बौद्धिक परीक्षाओं से गुज़रना होता है। एक जिलाधिकारी बनना किसी भी युवा का सपना हो सकता है। एक आइ. ए. एस. की तुलना में निपट मूर्ख, निरक्षर भट्टाचार्य जन-प्रतिनिधि उसकी छाती पर मंत्री बन कर बैठ जाता है, उसको उल्टे-सीधे आदेश देता है, न माने तो उसका ट्रांसफर कर देने के अधिकार रखता है - क्या ये किसी लायक लोकतंत्र के लक्षण हैं? क्या बॉस को कम से कम अपने सचिव जितना शिक्षित होना अनिवार्य नहीं होना चाहिये? यदि ऐसी व्यवस्था कर दी जाये कि एम.पी. या एम.एल.ए. का चुनाव वही व्यक्ति लड़ सकता है जो आइ.ए.एस. की प्रिलिमिनरी परीक्षा पास कर चुका हो तो क्या चुनाव लड़ने के इच्छुक टिकटार्थियों की संख्या में पर्याप्त कमी नहीं दिखाई देगी? क्या हमारे जन-प्रतिनिधियों के बौद्धिक स्तर में गुणात्मक परिवर्तन दिखाई नहीं देंगे?
आज हम स. मनमोहन सिंह का इतना सम्मान क्यों करते हैं? वह एक लब्धप्रतिष्ठ अर्थशास्त्री हैं, भारतीय रिज़र्व बैंक के गवर्नर रह चुके हैं, देश की अर्थव्यवस्था की बारीकियों को भली प्रकार समझ सकते हैं - उनका आइ.ए.एस. सचिव उनके सिर पर सवार नहीं हो सकता क्योंकि उसे पता है कि उसका बॉस उससे अधिक विद्वान यदि न भी होगा तो उसके जितना तो विद्वान है ही ।
आप कोई भी सरकारी नौकरी के लिये आवेदन करें तो आपकी स्वास्थ्य परीक्षा होती है। (स्वास्थ्य परीक्षा सेना में भर्ती के लिये ही नहीं, सरकार के सभी विभागों में सेवा पाने के लिये अनिवार्य है।) परंतु हमारे लायक लोकतंत्र में चुनाव लड़ने के लिये, एम.पी., एम.एल.ए. बनने के लिये, मंत्री बनने के लिये बीमार होना कहीं आड़े नहीं आता। फल यह है कि चुनाव जीतते ही, हमारे जन-प्रतिनिधि सरकारी खर्च पर ऑपरेशन कराने के लिये अमेरिका या इंग्लैंड भागते हैं और देशवासियों की खून-पसीने की कमाई से बटोरे गये टैक्स इस प्रकार इन लोगों पर लुटाये जाते हैं। क्या इसमें कुछ बुराई है कि चुनाव लड़ने के इच्छुक व्यक्ति को कठिन स्वास्थ्य परीक्षा से गुज़ारा जाये और जो इस परीक्षा में असफल हों वह अपने घर बैठ कर अपना इलाज़ करायें?
आम लोक सेवकों की भांति जन-प्रतिनिधियों की भी सेवा-निवृत्ति की आयु तय की जाये इसमें क्या बुराई हो सकती है?
अभी कुछ वर्ष पूर्व कानून में संशोधन कर के यह प्रावधान कर दिया गया कि सदन पांच वर्ष तक चले या न चले, सांसदों, विधायकों की पेंशन तो पक्की हो ही जायेगी। आजकल देख रहा हूं कि हिंदुस्तान समाचार पत्र में हमारे देश के सभी सांसदों की सक्रियता (परफॉर्मेंस) से संबंधित बहुत महत्वपूर्ण व रोचक जानकारी पाठकों तक क्रमिक रूप से पहुंचायी जा रही है जिसे देख कर स्पष्ट है कि हमारे अधिकांश सांसद या तो सदन से अनुपस्थित रहते रहे हैं, या फिर सदन में उपस्थित रह कर भी ऊंघते रहे हैं। क्या इसमे कुछ बुराई है कि पेंशन की राशि तय करने के लिये नये सिरे से पैरामीटर बनाये जायें और यह परफोरमेंस (performance based) पर आधारित हो?
उपाय तो बहुत हो सकते हैं, चुनाव आयोग भी इस विषय में चिन्तित है। यह भी तय है कि हमारे जन-प्रतिनिधि ऐसे हर किसी प्रयास का पुरजोर विरोध करेंगे। आखिर ये उनकी रोज़ी-रोटी से जुड़ा सवाल है!! वे भला क्यों चाहने लगे कि उनकी गर्दन पर आरी चले? पर बंधु, लोकतंत्र केवल उसी समाज में सफल होता है जहां 'लोक' जागृत हो, 'तंत्र' में जो दोष दिखें, उनको दूर करते रहने की मानसिक तैयारी हो। हम भारतीय तो राजतंत्र के अभ्यस्त हैं। जो एम.एल.ए./एम.पी बन जाता है, उसको अपने मुहल्ले में बुला कर उसका अभिनन्दन करने की होड़ में लग जाते हैं - अपना काम निकलवाने के लिये उसके कृपा-पात्र बनना चाहते हैं। यदि हमें पता है कि वह व्यक्ति अनाचारी, दुराचारी है, जेल भी काट आया है तो भी उसको घर बुला कर उसका आतिथ्य करने में सौभाग्य मानते हैं। अभिनन्दन करते समय यह नहीं सोचते कि आखिर ये व्यक्ति अभी चुना ही तो गया है, पांच साल काम कर ले, उसके बाद देखेंगे कि अभिनंदन करना है या गधे की सवारी करानी है।
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बुधवार, 18 मार्च 2009
आवश्यकता है ५४२ नालायकों की !
देश को ५४२ नालायकों की तुरंत आवश्यकता है। चयन होते ही आने वाली सात पीढ़ियों तक का जुगाड़ होने की पूरी गारंटी है। वेतन पर कोई आयकर नहीं, जब मर्ज़ी, जितना मरज़ी वेतन स्वयं बढ़ा लेने की सुविधा उपलब्ध है। काम की कोई जिम्मेदारी नहीं है। ऑफिस में आओ, या न आओ, आपकी इच्छा पर निर्भर करेगा। शिक्षा की कोई आवश्यकता नहीं है, अंगूठा छाप भी चलेगा। रिश्वत लेने देने की पूर्ण स्वतंत्रता रहेगी इस बारे में विशेषाधिकार आपकी रक्षा करेगा ।
एकमात्र अनिवार्य अर्हता है - जनता को अपनी लच्छेदार बातों से, धन बल से, बाहु बल से - येन-केन प्रकारेण बहला कर, फुसला कर, आतंकित करके, प्रताड़ित करके, बूथ लूट कर, घपलेबाजी करके - यानि किसी भी प्रकार से वोट हासिल करने होंगे। यदि आप हत्या, बलात्कार आदि-आदि किसी जुर्म में जेल की सज़ा काट रहे हैं तो भी कोई विशेष दिक्कत नहीं है - आप अपने गुर्गों की सहायता से चयन प्रकिया में भाग ले सकेंगे।
चयनित व्यक्ति का मुख्य कार्य भाषण देना, सार्वजनिक अभिनंदन कराना, मालायें पहनना, जब तब विदेश यात्रा करना, लोगों के अंट-शंट काम निपटाने में उनकी मदद करना आदि रहेंगे। आदर्शवादी आवेदन करने की चेष्टा / धृष्टता न करें, उनका आवेदन पत्र प्रथम दृष्टया निरस्त कर दिया जायेगा।
इच्छुक व्यक्ति २०-३० लाख रुपये पार्टी चंदे के रूप में जेब में डाल कर लाइन में लग जायें।
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